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सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

विज्ञान के आगे चले ये हो कसौटी काव्य की

साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

पिछला हफ़्ता तो पूरा का पूरा दिवाली के मूड वाला हफ़्ता रहा| रियल लाइफ हो या वर्च्युअल, जहाँ देखो बस दिवाली ही दिवाली| शुभकामनाओं का आदान प्रदान, पटाखे और मिठाइयाँ| उस के बाद भाई दूज, बहनों का स्पेशल त्यौहार| इस सब के चलते हम ने पोस्ट्स को एक बारगी होल्ड पर रखा और इसी दरम्यान अष्ट विनायक दर्शन को निकल लिए|


पिछले हफ्ते हमने पढ़े थे शेखर चतुर्वेदी के, हल्की-फुल्की चुटकियाँ लेते हास्य रस आधारित हरिगीतिका छंद, और आज पढेंगे धर्मेन्द्र भाई को| धर्मेन्द्र भाई ने श्रृंगार रस, बात्सल्य रस के अलावा एक अन्य छंद के माध्यम से काव्य को विज्ञान का आधार बनाने की वकालत भी की है| तो आइये पढ़ते हैं उन छंदों को :-



आ सामने तेरे, कसौटी स्वर्ण भी चढ़ता नहीं| 
चाँदी करे अनुरोध, मुझको, सामने जाना नहीं|| 

हिमखण्ड, हर हीरा हुआ, हत-प्राण, हीरक-हार है| 
जब राह भूले तू, वही दिन, हाट का त्यौहार है|१| 


हर कल्पना की भावना बन, तू सदा सजती रहे| 
संगीत गर तू ही हमारे - गीत का बनती रहे||  

अनुरोध मेरा मानकर, सँग - सँग सदा चलती रहे| 
तो ज़िंदगी भर, गीत तेरे, लेखनी लिखती रहे|२| 


मुस्कान तेरी, इक कठिन सप्ताह का - रविवार है| 
यह तोतली वाणी, मुझे, स-शरीर देती - तार है|| 

तुझ बिन मिले जो भी खुशी, वह भार है, बेकार है| 
तू साथ हो तो ज़िंदगी भर, ज़िंदगी - त्यौहार है|३| 


अंधा हुआ जो ज्ञान, सब मिट जायगा, संसार से| 
यदि नाव खेना ज्ञान की, तो, भाव की पतवार से|| 

हम ज्ञान को कर दें सजग, कर - कल्पना, सम्भाव्य की| 
विज्ञान के आगे चले, ये हो कसौटी - काव्य की|४|


विज्ञान के आगे चले - ये हो कसौटी काव्य की| वाह क्या अद्भुत आव्हान है| कवि की कल्पना इन शब्दों के साथ और भी अधिक मुखर हो उठी है| सिवाय इस के - 'मुस्कान तेरी एक कठिन सप्ताह का रविवार है' - के माध्यम से धर्मेन्द्र भाई ने आयोजन में एक अलग तरह की मिसाल पेश की है| इन छंदों में बहुत कुछ है कोट करने लायक, आप खुद एन्जॉय करें और रचनाधर्मी का दिल खोल कर उत्साह वर्धन करें| धर्मेन्द्र भाई ने गणेश विवाह पर भी कुछ छंद भेजे हैं, जिन्हें ठाले-बैठे पर वातायन के अंतर्गत आने वाले दिनों में पढ़ा जा सकता है| तो आनंद लीजिये आप इन छंदों का, टिप्पणियां करने में पीछे न रहें, हम ज़ल्द ही हाज़िर होते हैं एक और नयी पोस्ट के साथ|


जय माँ शारदे!


धर्मेन्द्र कुमार 'सज्जन'


मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

नज़रें लड़ीं जिससे, वही, भैया बता के चल पडी

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन


मंच के सभी कुटुम्बियों को एक दूसरे की तरफ़ से 
दीप अवलि 
की हार्दिक शुभकामनाएँ



हरिगीतिका छंद पर आधारित इस आयोजन में आज हम हास्य आधारित छंद पढेंगे| क्यूँ भाई, हास्य रस सिर्फ होली पर ही होता है क्या? दिवाली पर भी तो हँस सकते हैं हम.....................

दिलफेंक थे शौक़ीन आशिक, मनचला  कहते जिसे|
दिल में समा जाती वही, हम - देखते तकते  जिसे||
जब पाठशाला में गये थे , प्रथम कक्षा के लिये|
इक दिलरुबा के संग बैठे , हाथ हाथों में दिये|१|

अनुरोध है विनती सभी से, बात ये सच मानिये|
दिल ने हमें कितना सताया , आप सब भी जानिये||
जब आठवीं में आ गये, इक, नाजनीं दिल में धँसी|
हम हो गये लट्टू, तभी से, जान आफत में फँसी|२|

जाना पड़ा उसको मगर वो, शहर यारो छोड़के|
जाने विधाता को मिला क्या, दिल हमारा तोड़के||
गर तू नहीं तो और भी हैं, बात ये मशहूर है|
दिल को सहारा चाहिये, जो - आदतन मजबूर है|३|

यूँ हर परीक्षा पार कर, हम, आ गये कोलेज में|
हर नाज़नीं की जन्म पत्री, दर्ज थी नोलेज में||
पर हाय री किस्मत, कहानी - किसलिए  ऐसी गढ़ी|
नज़रें लड़ीं जिससे, वही, भैया बता के चल पडी|४|

फ़िर छा गया जैसे अँधेरा, राह भी वीरान थी|
बस ये इबादत कर रहा था, मुश्किलों में जान थी||
भटकन करो ये ख़त्म, प्रभु जी, ताकि मौज-बहार हो|
मिल जाय वो जिससे कि जीवन हर घडी त्यौहार हो|५|



शेखर भाई ये तो आप की ही नहीं, और भी बहुतों की कहानी है| बड़ा दिल टूटता है जब दिलरुबा भैया बोल देती है, सच न आये तो डिटेल में शेषधर तिवारी जी से पूछ लेना| हास्य के रंगों को बिखेर कर आप ने दिल खुश कर दिया, और इस पर्व को और भी खुशनुमा बना दिया| जय हो|
साहित्य वारिधि डा. शंकर लाल 'सुधाकर' जी के पौत्र शेखर चतुर्वेदी के ये छंद साबित करते हैं कि छंद एक फोर्मेट होता है और कवि उस प्रारूप का इस्तेमाल अपनी पसंद के विषय पर अपने हिसाब से बखूबी कर सकता है| शेखर ने इन छंदों में समस्या पूर्ति के दिए गए तीनों शब्दों का सदुपयोग भी जबरदस्त तरीक़े से किया है| ऎसी बातें सहज ही प्रभावित करती हैं|

बहुत जल्द ही हम श्रृंगार रस वाले छंद भी पढेंगे और ज़मीनी पारिवारिक मसलों को बतियाते छंद भी| तो आप पढियेगा इन छंदों को, दिल खोल के उत्साह वर्धन करिएगा इस कल के दिलफेंक आशिक बट आज के सुहृद गृहस्थ का और हम एज यूज्युअल तैयारी करते हैं अगली पोस्ट की|

जय माँ शारदे!

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

कर दे कृपा मैया हमारी, हम बहुत बेहाल हैं

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन


माहौल दिवाली मय होने लगा है सारे हिन्दुस्तान में| दीपावली पर्व की तैयारियाँ सब जगह जोरों पर हैं| होली और दीवाली इन दो पर्वों की धूम तो सारे हिन्दुस्तान में रहती है| हरिगीतिका छंद आधारित समस्या पूर्ति आयोजन के अगले चक्र में आज हम पढ़ते हें सुरेन्द्र भाई के मनोहारी छंद




 त्यौहार 

मातेश्वरी   तेरी  कृपा  की, दृष्टि  यदि हो जाएगी |
त्यौहार जैसी जिन्दगी की, हर घड़ी हो जाएगी || 
तू है जगत की जानकी माँ, हम तिहारे लाल हैं |
कर  दे  कृपा  मैया  हमारी, हम बहुत बेहाल हैं |१|
कसौटी 
अपनी भला औकात क्या? जो, तव कसौटी पर चढ़ें |
नादान, अवगुण-खान हम किस, राह पर जननी बढ़ें ||
हे ज्योति ! जीवन को हमारे, ज्योतिमय कर दीजिये |
अपने पदाम्बुज में जननि हे ! शरण हमको  दीजिये |२|


प्रार्थना
 
सन्मार्ग पर चलते रहें माँ, जिन्दगी  हो व्यर्थ ना |
नित राष्ट्र सेवा रत रहें, अम्बे  यही  है  प्रार्थना ||
हर   आदमी  इक दूसरे के, सुख व दुख में साथ हो |
जग में हिमालय की तरह निज, हिंद उन्नत-माथ हो |३| 
सुरेन्द्र जी इस समय स्वास्थ्य को ले कर परेशान हैं, फिर भी छंद साहित्य की सेवा के लिए न सिर्फ उन्होंने अपने छंद भेजे हैं बल्कि टिप्पणियों के माध्यम से भी लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं| सब से पहले हमने इन के कुण्डलिया छंद पढ़े थे, फिर घनाक्षरी छंद और अब हरिगीतिका छंद| इन के ब्लॉग के नियमित पाठक जानते हें, काव्य की विविध विधाओं में सिद्धहस्त सुरेन्द्र भाई भावों को बड़े ही सुन्दर ढंग से अभिव्यक्त करते हैं| 'हम बहुत बेहाल हैं' - जगत्जननी माँ का स्वयं को लाल बताने वाले की प्रार्थना ऐसी ही होनी चाहिए| इस में कोइ लाग लपेट नहीं है, कोइ फोर्मलिटी  नहीं है न करुणा का अतिवाद ही| एक बच्चा जैसे अपनी माँ से बात कर रहा हो, ठीक वैसे ही व्यक्त किया गया है इन छंदों में मनोभावों को, और यही विशिष्टता भी है|
सुरेन्द्र भाई के छंदों का आप लोग आनंद लें,अपनी टिप्पणियों की बरसात करें, और हम तैयारी करते हें अगली पोस्ट की|


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दो खुशियाँ आप सभी के साथ साझा करनी थीं| एक तो ये कि हमारे-आपके सम्यक छान्दसिक प्रयासों से प्रेरणा पा कर एक और कवयित्री ऋता शेखर 'मधु' ने छंदों में रुझान व्यक्त किया है, जो कि आज के शेरोशायरी प्रधान दौर में बहुत बड़ी बात है| दूसरी ये कि हमारे एक और साथी आ. सौरभ पाण्डेय जी ने समस्या पूर्ति से जुड़ने के बाद, समस्या पूर्ति के आयोजन के अतिरिक्त भी छंद लिख कर भेजे हें, वो भी ऐसा  वैसा  नहीं, सांगोपांग सिंहावलोकन छंद| एक दो दिन में ये छंद ठाले बैठे पर वातायन के अंतर्गत प्रकाशित होंगे| आप पढने आइयेगा अवश्य, ठाले बैठे की पोस्ट की मेल नहीं भेज रहा मैं आज कल| स्नेही स्वयँ आते हैं, पढ़ते हैं और अपनी यथेष्ट राय भी व्यक्त करते हैं|

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जय माँ शारदे!

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