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सोमवार, 27 जून 2011

चौथी समस्या पूर्ति - घनाक्षरी - बन्नो के हैं आभूषण-परिधान भ्रष्टाचार

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

दो नौजवान कवियों के छन्द पढ़ने के बाद, इस आयोजन के नौवें चक्र में आज हम पढ़ेंगे आदरणीय श्री बृजेश त्रिपाठी जी के छंदों को| इस पोस्ट के साथ इस आयोजन के कवियों की संख्या हो गई ११ और घनाक्षरी छंदों की संख्या हो गई ३०|

आदरणीय श्री बृजेश त्रिपाठी जी को इस मंच पर हम पहले भी पढ़ चुके हैं| जैसा कि हमने पिछली पोस्ट में कहा था कि कवि की कल्पना अथाह सागर की भांति होती है, उसी को चरितार्थ करते हैं आप के छन्द| अनुभवी निगाहें, बात में से कैसे बात निकाल लेती हैं, इस का अच्छा उदाहरण दे रहे हैं आप| हालाँकि रस परिवर्तन जैसी कुछ रियायतें ली हैं आपने, परन्तु उम्र को दरकिनार करती छन्द साहित्य की सेवा और विषय की विशिष्टता उसे ढँक देती है| आइये पढ़ते हैं - भ्रष्टाचार पर निशाना साधते इन के छंदों को:-




साधु-संतो-योगियों पे, कीजिये न अत्याचार,
संतों से ले कर सीख, भ्रष्टता मिटाइए|

सोती हुई जनता पे, लाठियाँ चलाते हुए,
थोडा थमिएगा, थोडा - सा तो शरमाइए|

काले धन की वापसी - पे हैरानी होती है क्यों,
काले धन को वापस, देश में ही लाईये|

खुद ही जो दोषी हों तो, करें प्रायश्चित आप,
राजनीति का अखाडा, घर न बनाईये||

[सम सामयिक विषय पर दो टूक बात कही है आपने| काले धन की वापसी
होनी ही चाहिए| और 'खुद ही दोषी हों' वाली बात तो क्या कहने|
नीतिगत विषय पर उम्दा प्रस्तुति]


ऊबड़-खाबड़ चाँद - से न तुलना करो जी
जानिए कि उसने क्यों - खुद को छिपाया है|

कहाँ सदरीति, कहाँ - रूखा-सूखा निशापति,
तुलना की कल्पना से, व्योम घबड़ाया है|

लाठी - गोली - आँसू-गैस, सारे हथकंडे फेल,
ब्यूटी-कम्पटीशन में, वो हड़बड़ाया है|

जग की अनीति पे तू, भारी सदा सदरीति
देख तेरी सुन्दरता, चाँद भी लजाया है||

[ओहो, इस पंक्ति को ले कर इस तरह की प्रस्तुति!!! है न अनुभव वाली बात!!!!
वाकई सदरीति की भला क्या तुलना रूखे सूखे निशापति से| रस-विषय
परिवर्तन जो थोड़ा सा है भी, विशिष्टता को ले कर आया है|
'ब्यूटी कम्पटीशन' का बहुत ही मनोहारी प्रयोग किया है
आपने, बधाई के पूरे पूरे हकदार हैं आप]


बन्नो सरकारी वेश-भूषा में सुन्दर लगे,
बन्ने का तो भेष ही, रोचक समाचार है|

बन्नो के हैं आभूषण-परिधान भ्रष्टाचार,
बन्ने का तो भगवा दुपट्टा कंठहार है|

बन्नो शरमीली, मुँह - ढाँपे फिरे दशकों से,
बन्ने का तो ऊँचा स्वर एक इश्तहार है|

बन्नो खिसियाई बिल्ली, खम्भा नोचने में लगी,
बन्ने का बदन जैसे क़ुतुब मीनार है||

[ हास्य रस पर केन्द्रित इस पंक्ति पर आपने गज़ब की
व्यंग्यातमक प्रस्तुति दी है| कवि की कल्पना है भाई]


जहाँ चाह, वहाँ राह| कवि ठाने, तो कल्पनाएं खुद-ब-खुद चल कर आती हैं उस के पास| रूपक और उपमाएँ हाजिर रहती हैं उस के दरबार में| विषय - कल्पना - व्याकरण - रस - छन्द -अलंकार वगैरह का संसार बहुत बड़ा है| आलोचक और समीक्षक अभी भी उस पर काम कर रहे हैं, निष्कर्ष प्रतीक्षारत है :)| परिवर्तन संसार का अकाट्य नियम है|

छंदों को सिर्फ एक फॉर्मेट / उपकरण मानते हुए, यदि उन पर समय के अनुसार हम लोग अच्छे, तार्किक और जन-साधारण को रुचिकर प्रयोग करते रहेंगे, तो इन छंदों को अगली पीढ़ियों तक 'सहज-स्वीकृत' रूप में पहुँचा पाएंगे, अन्यथा सत्य हम सब जानते ही हैं|

आदरणीय त्रिपाठी जी के इन अनमोल छंदों का रस पान करने के साथ साथ इन पर अपनी टिप्पणी रूपी पुष्प वर्षा आप को करनी है और हमें तैयारी करनी है एक और हिलाऊ टाइप पोस्ट की|

कुछ और मित्रों ने भी छन्द भेजे हैं, उन की लगन और दृढ़ इच्छा शक्ति को प्रणाम| व्यस्तता वश उत्तर पेंडिंग हैं, पर जल्द ही ये काम भी शुरू किया जायेगा| तब तक उन सभी मित्रों से निवेदन है कि इस आयोजन की घनाक्षरी छन्द संबन्धित अब तक की सभी पोस्ट पढ़ें, घोषणा वाली पोस्ट को बार बार पढ़ें, दी गईं औडियो लिंक्स को बार बार सुनें, इस से हमारा और उन का - दोनों का काम काफी आसान हो जाएगा| उन की आसानी के लिए सारी की सारी लिंक्स एक बार फिर से यहीं इसी पोस्ट में नीचे दी गई हैं|


इस आयोजन को आप लोगों द्वारा प्रदत्त सहयोग के लिए बहुत बहुत आभार| मित्रो, कभी कभी ठाले-बैठे भी देख लिया करो, भाई कवि हैं हम भी तो, आप की राय की प्रतीक्षा हमें भी रहती है|


जय माँ शारदे!

गुरुवार, 23 जून 2011

चौथी समस्या पूर्ति - घनाक्षरी - घुंघटे की तिजोरी में बंद सरमाया है

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन


आज पोस्ट लिखते हुए गुरुजी [स्व. 'प्रीतम' जी] की बहुत याद आ रही है| वो अक्सर कहते थे, दूसरों को उन की गलतियाँ बताना जितना जरूरी है, उस से हजार गुना ज्यादा जरूरी है उन की अच्छाइयों को सारे जमाने के साथ शेयर करना|

पिछली पोस्ट में हम ने धर्मेन्द्र भाई के बेजोड़ छंदों का आनंद उठाया| आज की पोस्ट में मिलते हैं एक नौजवान शायर / कवि से| शायर इसलिए कि ये गज़लों पर ही ज्यादा बातें करते रहे हैं, और कवि इसलिए कि इन्होंने छन्द भी भेजे हैं| फ़ौज़ में हैं तो ज़ाहिर सी बात है कि इन के छंदों में देशभक्ति ज्यादा है|




सीमा पार से जो हो रहा है उग्रवाद अभी,
उस पर आपकी तवज्जो अभी चाहिए|

नेता, मंत्री, सांसद जी आपसे है इल्तिजा ये,
देश के ही लोगों में तो दोष न गिनाइये|

चंद वोटों के लिए न आपस में लड़िए जी,
भाई भाई को तो आपस में न लड़ाइये|

मुल्क अपना ये घर कहता है आर पी ये,
राजनीति का अखाड़ा घर न बनाइये||

[वाह आर. पी., इस पंक्ति पर बेहतरीन प्रस्तुति| जियो मित्तर जियो| टी वी वाले छंद
पढे, घर गृहस्थी वाले छंद पढे और अब ये देश भक्ति
वाला छंद| बहुत खूब]



बड़ा धनवान और पूंजीपति है वो बड़ा,
तेरे जैसा महबूब जिसने भी पाया है |

पागल बनाया कितनों की है उडाई नींदें,
कितनों का सुख चैन तुमने चुराया है |

लाखों हैं लुटेरे यहाँ लूट लें न इसीलिए,
घुंघटे की तिजोरी में बंद सरमाया है |

इतराता था जो कभी अपनी सुंदरता पे,
देख तेरी सुंदरता चाँद भी लजाया है||

['घुंघटे की तिजोरी में बंद सरमाया' हाए हाए हाए, क्या कल्पना
है भई वाह| घनाक्षरी में शायरी की खूबसूरती,
क्या कहने| ]



डेढ़ फुटिया बन्ना भी चला ब्याह करने को,
उसको भी घोड़ी चढने का अधिकार है |

आइना भी डर जाये बन्नो की सूरत देख,
कहे मुझ पर हुआ भारी अत्याचार है |

भेंगी आँख, टेढ़ी नाक, हाथी जैसे कान लिए,
वरमाला थामे बन्नो कब से तैयार है |

गोंद में ही वरमाला पहनानी पड़ी क्यूंकि,
बन्नो का बदन जैसे क़ुतुबमीनार है||

[आईने पर अत्याचार - ओहो, और गोद में वरमाला -
वाह क्या तीर खींच के मारा है, ये डेढ़ फूटिया
भी खूब ढूँढ के निकाला है]

कवि की कल्पना एक अथाह सागर की तरह होती है| माँ शारदे किस से क्या लिखवा दें, कुछ भी पहले से तय नहीं होता| बस इसी तरह साहित्य सृजन चलता रहा है, चल रहा है, चलता रहेगा - कोई माने या न माने| लीक से हट कर चलने वाले कवि / शायरों को इसीलिए तो ज़माना याद करता है भाई| वर्तमान समय की बारीकियों को समझते हुए शायद इसीलिए भाई मयंक अवस्थी जी ने लिखा होगा "अगर साहित्य का मूल्यांकन उस के कला पक्ष पर किया जाये, तो तुलसी से अधिक कालिदास प्रासंगिक होते"|

तो सुधि पाठको, आप सभी आर. पी. के मस्त मस्त छंदों का आनंद लें, और टिप्पणियाँ भी ज़रूर दें|

फिर मिलते हैं अगले हफ्ते अगली पोस्ट के साथ|

जय माँ शारदे!

सोमवार, 20 जून 2011

चौथी समस्या पूर्ति - घनाक्षरी - होंठ जैसे शहद में, पंखुड़ी गुलाब की हो

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन


घनाक्षरी छन्द पर आयोजित चौथी समस्या पूर्ति के इस सातवें चक्र में भी पढ़ते हैं एक इंजीनियर कवि को| इंजीनियर होने के नाते शब्दों की साज़-सज्जा काफ़ी बेहतरीन किस्म की करते हैं ये| छन्दों के प्राचीन प्रारूप को सम्मान देते हैं और नई-नई बातों को बतियाते हैं| आइए पढ़ते हैं इन के द्वारा भेजे गये छन्द:-





देवरानी मोबाइल, ले कर है घूम रही,
भतीजी ने सूट लिया, दोनों मुझे चाहिये|

सासू जी ने खुलवाया, नया खाता बचत का,
और ज्यादा नहीं मेरा, मुँह खुलवाइये|

ऐश सब कर रहे, हम यहाँ मर रहे,
बोल पड़ा मैं तुरंत, चुप रह जाइये|

सब अपने ही लोग, रहें खुश चाहता मैं,
राजनीति का अखाड़ा, घर न बनाइये||

[एकता कपूर उर्फ छोटे पर्दे की दादी अम्मा और टी. वी. महारानी की इस युग की विशेष
मेहरबानी रूप घर घर की कहानी कैसे कैसे गुल खिला रही है - इस का बहुत ही अच्छा
उदाहरण देखने को मिलता है इस छन्द में| छंदों को जन-मानस से जुडने के लिए
उन की बातें बतियाना बहुत जरूरी है]


आँख जैसे रोशनाई डल-झील में गिरी हो,
गाल जैसे गेरू कुछ दूध में मिलाया है|

केश तेरे लहराते जैसे काली नागिनों को,
काले नागों ने पकड़, अंग से लगाया है|

होंठ जैसे शहद में, पंखुड़ी गुलाब की हो,
पलकों ने बोझ, सारे - जहाँ का उठाया है|

कोई उपमान नहीं, तेरे इस बदन का,
देख तेरी सुंदरता चाँद भी लजाया है||

[रूपक व उपमा जैसे अलंकारों से सुसज्जित इस छन्द की जितनी तारीफ की जाए कम है|
डल-झील, गेरू-दूध के अलावा पलकों ने सारा बोझ वाली बातों के साथ यह घनाक्षरी
किस माने में किसी रोमांटिक ग़ज़ल से कम है भाई? आप ही बोलो...]


सूखा-नाटा बुड्ढा देखो, चला ब्याह करने को,
तन को करार नहीं, मन बेकरार है|

आँख दाँत कमजोर, पाजामा है बिन डोर,
बनियान हर छोर, देखो तार-तार है|

सरकता थोड़ा-थोड़ा, मरियल सा है घोडा,
लगे ज्यों गधा निगोड़ा, गधे पे सवार है|

जयमाल होवे कैसे, सीढ़ी हेतु हैं न पैसे,
बन्नो का बदन जैसे क़ुतुब मीनार है||

[करार-बेकरार, कमजोर-बिन डोर-हर छोर, थोड़ा-घोड़ा-निगोड़ा और कैसे-जैसे शब्द प्रयोगों
के साथ आपने अनुप्रास अलंकार की जो छटा दर्शाई है, भाई वाह| जियो यार जियो]

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और अब बारी है उस छन्द की जिस का मुझे भी बेसब्री से इंतज़ार था| श्लेष अलंकार को लक्ष्य कर के आमंत्रित इस छंद में कवि ने 'नार' शब्द के जो दो अर्थ लिए हैं वो हैं [१] गर्भनाल, और [2] कमलनाल| छन्द क्यों विशेष लगा इस बारे में बाद में, पहले पढ़ते हैं इस छन्द को|


'पोषक' ये खींचती है, तन को ये सींचती है,
द्रव में ये डूबी रहे, किन्तु कभी गले ना|

जोड़ कर रखती है, जच्चा-बच्चा एक साथ,
है महत्वपूर्ण, किन्तु - पड़े कभी गले ना|

जब तक साथ रहे, अंग जैसी बात रहे,
काट कर हटा भी दो, तो भी इसे खले ना|

पहला-पहला प्यार, दोनों पाते हैं इसी से,
'शिशु' हो या हो 'जलज', "नार" बिन चले ना||

[अब देखिये क्या खासियत है इस छन्द की| पहले आप इस पूरे छन्द को (आखिरी चरण
को छोड़ कर) गर्भनाल समझते हुए पढ़िये, आप पाएंगे - कही गई हर बात इसी अर्थ का
प्रतिनिधित्व कर रही है|दूसरी मर्तबा आप इसी छन्द को कमलनाल के बारे में समझते
हुए पढ़िये, आप पाएंगे यह छन्द कमलनाल के ऊपर ही लिखा गया है| यही है जादू
इस विशेष पंक्ति वाले छन्द का| इस प्रस्तुति के पहले वाले छन्द भी श्लेष पर हैं,
पर यह छन्द पूरी तरह से सिर्फ एक शब्द के अर्थों में ही भेद करते हुए श्लेष का
जादू दिखा रहा है| इसके अलावा इस छन्द में एक और चमत्कार है| 'गले ना'
शब्द प्रयोग दो बार है| एक बार उस का अर्थ है 'गर्भनाल / कमलनाल द्रव
में रहते हुए भी गलती नहीं है', और दूसरा अर्थ है 'गले नहीं पड़ती'|
है ना चमत्कार, यमक अलंकार का? इस अद्भुत प्रस्तुति
के लिए धर्मेन्द्र भाई को बहुत बहुत बधाई]

जय हो दोस्तो आप सभी की और अनेकानेक साधुवाद आप लोगों के सतप्रयासों हेतु| धर्मेन्द्र भाई के छंदों का आनंद लीजिये, टिप्पणी अवश्य दीजिएगा| जिन कवि / कवियात्रियों के छन्द अभी प्रकाशित होने बाकी हैं, यदि वो उन में कुछ हेरफेर करना चाहें, तो यथा शीघ्र करें| जिन के छन्द प्रकाशित हो चुके हैं, वो फिर से छन्द न भेजें|

जय माँ शारदे!

शनिवार, 18 जून 2011

चौथी समस्या पूर्ति - घनाक्षरी - गर्दभ कहे गधी से, आँख मूँद, कर जोड़

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन


कल अचानक ही बैठे बैठे मन में ख़्याल आया क्यूँ न ब्लॉग के फ़ॉर्मेट में कुछ फेरफार किया जाए| फिर क्या, लग पड़ा, और जो परिवर्तन हुए आप के समक्ष हैं| ब्लॉग के दाएँ-बाएँ वाली पट्टियों को देख कर अपनी राय अवश्य दें| "ई- क़िताब" तथा ठाले-बैठे ब्लॉग की 200वीं पोस्ट पर आप लोगों की प्रतिक्रियाएँ पढ़ कर उत्साह में अभिवृद्धि हो रही है|

समस्या पूर्ति मंच द्वारा घनाक्षरी छन्द पर आयोजित चौथी समस्या पूर्ति के इस छठे चक्र में आज हम उन को पढ़ते हैं जो कई वर्षों से अन्तर्जाल पर छन्दों को ले कर सघन और सतत प्रयास कर रहे हैं|


लाख़ मतभेद रहें, पर मनभेद न हों,
भाई को हमेशा गले हँस के लगाइए|

लात मार दूर करें, दशमुख सा -अनुज,
दुश्मन को न्योत घर, कभी भी न लाइए|

भाई नहीं दुश्मन जो, इंच भर भूमि न दें,
नारि-अपमान कर, नाश न बुलाइए|

छल-छद्म, दाँव-पेंच, द्वंद-फंद अपना के
राज नीति का अखाड़ा घर न बनाइये||

[सलिल जी का छन्द और शब्दों की कारीगरी न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता| 'इंच भर भूमि'
और 'दशमुख सा अनुज' को इंगित कर के आपने 'राजनीति का अखाड़ा' वाली इस
पंक्ति को महाभारत तथा 'रामायण' काल की घटनाओं से जोड़ दिया है]



जिसका जो जोड़ीदार, करे उसे वही प्यार,
कभी फूल कभी खार, मन-मन भाया है|

पास आये सुख मिले, दूर जाये दुःख मिले,
साथ रहे पूर्ण करे, जिया हरषाया है|

चाह-वाह-आह-दाह, नेह नदिया अथाह,
कल-कल हो प्रवाह, डूबा-उतराया है|

गर्दभ कहे गधी से, आँख मूँद - कर - जोड़,
देख तेरी सुन्दरता चाँद भी लजाया है||

[क्षृंगार रस में हास्य रस का तड़का, क्या बात है आचार्य जी| चाह, वाह, दाह, आह, अथाह.
प्रवाह जैसे शब्दों से आपने इस छन्द को जो अलंकृत किया है, भई वाह|
'आँख मूँद - कर - जोड़' वाला प्रयोग भी जबर्दस्त रहा]



शहनाई गूँज रही, नाच रहा मन मोर,
जल्दी से हल्दी लेकर, करी मनुहार है|

आकुल हैं-व्याकुल हैं, दोनों एक-दूजे बिन,
नया-नया प्रेम रंग, शीश पे सवार है|

चन्द्रमुखी, सूर्यमुखी, ज्वालामुखी रूप धरे,
सासू की समधन पे, जग बलिहार है|

गेंद जैसा या है ढोल, बन्ना तो है अनमोल,
बन्नो का बदन जैसे, क़ुतुब मीनार है||

[हास्य रस के साथ साथ इस छन्द में अनुप्रास अलंकार की छटा देखते ही बनती है| इस के सिवाय 'माँ' शब्द का एक नया पर्यायवाची शब्द भी पढ़ने में आया है इस छन्द में - 'सासू की समधन']


ये तो सब जानते हैं, जान के न मानते हैं,
जग है असार पर, सार बिन चले ना|

मायका सभी को लगे - भला, किन्तु ये है सच,
काम किसी का भी, ससुरार बिन चले ना|

मनुहार इनकार, इकरार इज़हार,
भुजहार, अभिसार, प्यार बिन चले ना|

रागी हो, विरागी हो या हतभागी बड़भागी,
दुनिया में काम कभी, 'नार' बिन चले ना||

[श्लेष अलंकार वाली इस विशेष पंक्ति पर आप के द्वारा 'नार' शब्द के तीन अर्थ लिए गये हैं -
ज्ञान-पानी और स्त्री| आचार्य जी के ज्ञान के बारे में क्या कहा जाए, हम सभी जानते हैं|
इस विशेष पंक्ति वाले विशेष छन्द में आप ने अनुप्रास अलंकार
की जो जादूगरी की है, देखते ही बनती है]


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खुद हमें भी पता नहीं था कि अब तक कुल जमा २८ कवि / कवियत्री इस मंच की शोभा बन चुके हैं| कल गिना तो मालुम पड़ा| आज के दौर में, 'छन्द साहित्य' जैसे कम रुचिकर विषय पर, जुम्मा जुम्मा ६ महीनों के अल्प काल में २८ कवि / कवियत्री, ३३ चौपाइयाँ, १०६ दोहे, ३६ कुण्डलिया और अब तक २० घनाक्षरी छन्दों के अलावा ४२००+ हिट्स के साथ आप लोगों ने जो चमत्कार किया है - उस की प्रशंसा के लिए शब्द नहीं मिल रहे| ये आप लोगों के सक्रिय सहयोग के कारण ही सम्भव हुआ है|

हमारे जो साथी किसी कारण वश वर्तमान में हम से दूर हैं, हम दिल से उन का आभार प्रकट करते हैं| मसलन, हमें याद है - इस मंच की सब से पहली प्रस्तुति - जब कंचन बनारसी भाई उर्फ उमा शंकर चतुर्वेदी जी द्वारा दी गई, तो मंच ने किस अंदाज़ में खुशी मनाई थी| कंचन बनारसी भाई, यह मंच आप का सदैव आभारी रहेगा| जिन लोगों ने समय समय पर मंच का मार्गदर्शन किया, उन के लिए भी मंच कृतज्ञ है| आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप लोग इस मंच को नित नई ऊँचाइयाँ प्रदान करने में सदैव आगे रहेंगे|

अगली पोस्ट में पढ़ते हैं विशेष पंक्ति वाले छन्द पर जादू करने वाले अगले जादूगर धर्मेन्द्र कुमार 'सज्जन 'को|

जय माँ शारदे!

शुक्रवार, 17 जून 2011

छंदों में मात्रा की गिनती - गण प्रकार और उनकी गणना


छंदों में मात्रा की गिनती


*अ इ उ क पि तु ------------------की एक [1] मात्रा


*आ ई ऊ ए ऐ ओ औ अं अः का पी तू को-----------की दो [2] मात्रा




*सत्य में 'स' की 1 आधे 'त' की 1 और 'य' की भी एक मात्रा = कुल मात्रा 3


*अंत में 'अं' की 2 और 'त' की 1 मात्रा = कुल मात्रा 3


*समर्पण में 'स' की 1 'म+र' की 2 'प' की 1 और 'ण' की 1 मात्रा = कुल मात्रा 5


*अतः में 'अ' की 1 और 'तः' की 2 मात्रा = कुल मात्रा 3


*रास्ता में 'रा' की 2 आधे 'स' की कोई नहीं और 'ता' की 2 मात्रा = कुल 4 मात्रा|
परंतु यदि इसी 'रास्ता' को 'रासता' की तरह बोला / लिखा जाये तो बीच वाले 'स' की 1 मात्रा जोड़ कर कुल 5 मात्रा|
सामान्यतः इस से बचा जाता है|



छंदों में गण प्रकार और उनकी गणना

सूत्र :- य मा ता रा ज भा न स ल गा

गण 1 = 'य'गण = य मा ता = लघु गुरु गुरु = 1 2 2

गण 2 = 'म'गण = मा ता रा = गुरु गुरु गुरु = 2 2 2

गण 3 = 'त'गण = ता रा ज = गुरु गुरु लघु = 2 2 1

गण 4 = 'र'गण = रा ज भा = गुरु लघु गुरु = 2 1 2

गण 5 = 'ज'गण = ज भा न = लघु गुरु लघु = 1 2 1

गण 6 = 'भ'गण = भा न स = गुरु लघु लघु = 2 1 1

गण 7 = 'न'गण = न स ल = लघु लघु लघु = 1 1 1

गण 8 = 'स'गण = स ल गा = लघु लघु गुरु = 1 1 2

'ल' का लतलब लघु यानि 1 मात्रा

'गा' का मतलब गुरु यानि 2 मात्रा

गुरुवार, 16 जून 2011

चौथी समस्या पूर्ति - घनाक्षरी - मैंने कहा पति हूँ मैं, कोई चपड़ासी नहीं

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन


आप लोगों के सक्रिय सहयोग के कारण अब इस घनाक्षरी वाले आयोजन में विशेष पंक्ति पर कम से कम 4 प्रस्तुतियों के साथ 14 से अधिक सरस्वती पुत्रों / पुत्रियों के छन्द पढ़ने का अवसर मिलना तय है| मंच आगे भी प्रयास करता रहेगा ताकि रचनाधर्मी अपना सर्वोत्तम लोकार्पित करें| आज की पोस्ट में हम मिलते हैं तीन नए सदस्यों से|




चितचोर बना मोर, पंख फैला थिरकता
रंगों की छटा बिखेर, मन में समाया है |


तेरा ये मधुर स्वर ,कानों में गूंजती धुन
जब स्वर पास आया, और पास लाया है|


अदभुत रूप तेरा, आकर्षित करता है
अपने जादू से तूने सबको लुभाया है|


मृदु मुसकान भरी, ऐसी प्यारी छवि तेरी
देख तेरी सुंदरता, चाँद भी लजाया है||

[आदरणीया निर्मला जी के लिए प्रयुक्त करने वाले शब्द ही इनके लिए भी प्रयुक्त
करूंगा - आशा जी आप ने इस उम्र में घनाक्षरी सीखने का जो बीड़ा उठाया
उस के लिए आप के जीवट को प्रणाम| सच सीखने की कोई भी उम्र नहीं
होती| चितचोर बना मोर ............. अदभुत रूप तेरा............
मृदु मुसकान ............. वाह क्या शब्द संयोजन किए हैं
आपने, वाह, आनंद आ गया|]









राग से ही राज आवे, रार को ना राम भावे
सार सार बात यही, खार को मिटाइए।
पत्‍नी को जलाए पति, रति में ही गति रहे
यति कैसे घर आए, मति को जगाइए।
बहु बोले सास अब, बेटे से तो आस नहीं
मैं तो चली काम पर, घर को सम्‍भालिए।
भाई भाई लड़ रहे, राई राई बंट रहे
राज‍नीति का अखाड़ा, घर ना बनाइए।

[कमाल है अजित जी पहली बार में ही इतना सुंदर छन्द| भाई लोग सँभल जाइए,
अब बहनें आ गई हैं ज़ोर शोर से| अजित जी, 'रति-गति-मति' में आपने
अनुप्रास का बहुत ही सुंदर प्रयोग किया है| इस के अलावा, बेटे से तो
आस नहीं - ऐसी पंक्ति कोई नारी शक्ति ही ला सकती थी|
सुंदर नहीं - बहुत सुंदर छन्द|]








सुबह के आठ बजे, बीवी की आवाज़ सुनी,
गर साँस ले रहे तो, अब उठ जाइए.

नौकर की छुट्टी आज, झाड़ू पोंछे जैसे काज,
मुझको आवे है लाज, आप निपटाइए,

मैंने कहा पति हूँ मैं, कोई चपड़ासी नहीं,
आप ऐसा मुझपे न, हुकम चलाइए.

सुबह उठते ही क्यों, बेलन दिखाती मुझे,
राजनीति का अखाड़ा, घर ना बनाइए.

[ये हमारे फेसबुक वाले मित्र हैं| पैरोडियों के माध्यम से लोगों को अक्सर गुदगुदाते
रहते हैं| उसी क्रम में इन्होंने, नीतिगत वाली पंक्ति पर हास्य प्रस्तुति दे दी है| क्या
करें भाई, भाभीजी के बेलन जी का चमत्कार जो है| इन्होंने औडियो क्लिप भी
भेजी थी, पर वो मुझसे अपलोड नहीं हो पायी| आइये हम इन के दुख में इन
को ढाढ़स बँधाते हैं, बाकी और क्या कर सकते हैं हम और आप :) ]


आज की इस पोस्ट से दो बातें सिद्ध हुईं, पहली तो ये कि यदि हम बहाने बनाना छोड़ कर कुछ करने की ठानें तो अवश्य कर सकते हैं और दूसरी ये कि घनाक्षरी [कवित्त] वाकई ऐसा जादुई छन्द है जो जाने अनजाने में अनुप्रास अलंकार ले ही आता है|

आइये हम सभी मंच पर इन तीनों सदस्यों का स्वागत और उत्साह वर्धन करें|

अब लगता है हफ्ते में दो से ज्यादा पोस्ट्स लगानी चाहिए| फिर मिलते हैं, जल्द ही अगली पोस्ट के साथ|


जय माँ शारदे!

सोमवार, 13 जून 2011

चौथी समस्या पूर्ति - घनाक्षरी - ताड़-सा , खजूर जैसा , आठवें अज़ूबे जैसा

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

समस्या पूर्ति मंच द्वारा घनाक्षरी छन्द पर आयोजित इस चौथी समस्या पूर्ति के चौथे चक्र में आप सभी का स्वागत है| सुरेन्द्र भाई, महेंद्र भाई और योगराज भाई के बाद अब हम पढ़ते हैं बीकानेर वाले राजेन्द्र स्वर्णकार जी को| सुरेन्द्र, महेंद्र और राजेन्द्र में 'द्र' की बारंबारता से अनुप्रास [वृत्यानुप्रास] अलंकार हुआ| अनुप्रास अलंकार के पांचों प्रकार, फिल्मी गानों के माध्यम से समझने के लिए यहाँ क्लिक करें|

तो आइये घूमने चलते हैं भाई राजेन्द्र जी के कल्पना लोक में..............




घर-परिवार है साक्षात् स्वर्ग ; स्वर्ग यह
त्याग श्रद्धा स्नेह सहयोग से सजाइए !
ईर्ष्या [ईरष्या] जलन द्वेष डाह चालबाजियों से
निंदा शक़ बैर से , माहौल न बिगाड़िए !
चैनलों के किस्सों की चपेट में उलझ कर
गृहस्थी बसी-बसाई हाथों न उजाड़िए !
देवियों ! माताओं ! बहनों ! भाभियों ! विनति है –
राजनीति का अखाड़ा घर न बनाइए !

[टी वी की महारबानी से घरों में राजनीति किस कदर हावी हो चुकी है, इसे बखूबी बखाना है अपने| यही होता है कवि का धर्म, कि हमारी जड़ों को हिलाने वाले तत्वों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करे]



कलियां कोमल अंग-अंग में सजी हैं तेरे
संदली बदन तेरा दूध में नहाया है !
रूप मनहरण लुभावना है सुंदरिये !
देखतेरी सुंदरता चांद भी लजाया है !
गढ़ के विधाता-सा चितेरा भी हुआ है धन्य
तुम्हें चाव लगन से जिसने बनाया है ।
धरती क्या , स्वर्ग में पाताल में भी नहीं दूजी
तुमने सौंदर्य ऐसा अद्वितीय पाया है !

[हाँ भाई हाँ| हम तो कुण्डलिया वाले आयोजन में पहले ही मान चुके हैं|
आप सोलह आने सही कह रहे हैं| मित्रो अंदर की बात आप को बता दूँ -
इस पंक्ति के प्रणेता स्वयं राजेन्द्र भाई ही हैं]



वरमाल लिये’ खड़ी , सोचे वधू घड़ी-घड़ी ,
हाय दैया… लीला तेरी कैसी करतार है ?
ताड़-सा , खजूर जैसा , आठवें अज़ूबे जैसा ,
बिजली का खंभा कोई जैसे बिना तार है !
मानुष है ? जिन्न है ? तैमूर का लकड़दादा ,
बन्ने का बदन जैसे कुतुबमीनार है !
दुल्हनिया गश खाए , सखियां मंगल गाए ,
आया ठूंठ ; ऊंट-सा बछेरी पे सवार है !

[ताड़ सा खजूर जैसा, आठवे अजूबे जैसा............... ठूंठ ; ऊंट-सा................ ये कल्पना
तो पहले की तीनों कल्पनाओं से एक दम डिफ़्रेंट आई है भाई| तैमूर का लकड़दादा,
भाई आप तो हमें बचपन वाली कोमिक्स की दुनिया में ले गए|
हास्य के अद्भुत रंग बिखेरे हैं आपने|]

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और अब बारी है विशेष पंक्ति वाली समस्या पूर्ति की| इस मंच की पहली विशेष पंक्ति पर पहली प्रस्तुति आई है राजेन्द्र भाई के द्वारा| आपने इस पंक्ति पर छन्द लिखने की ठानी और कर भी दिखाया| इस पंक्ति को ले कर अपेक्षा के ऑल्मोस्ट करीब हैं आप| छन्द शिल्प एक ऐसा विषय है जिस पर अलग अलग व्यक्ति अलग अलग मत रखते हैं| इन सब बातों के बावजूद कहना होगा कि आज के दौर में जब कवियों को छंदों में विशेष लगाव रह नहीं गया है, ऐसे में मित्र राजेन्द्र जी द्वारा इस दिशा में उठाए गए कदम की भूरि-भूरि प्रशंसा की जानी चाहिए|

साधारण भाषा में कहें तो श्लेष अलंकार यानि रहस्य बनाए रखते हुए डबल मीनिंग वाली बात| बात का अर्थ वक्ता और श्रोता अपने अपने हिसाब से निकालने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिये जाएँ|

अश्लील पक्ष को नज़र अंदाज़ कर दें, तो कादर खान और आनंद बक्षी जी ने फिल्मों में इस का भरपूर उपयोग किया है| श्लेष अलंकार के बारे में और अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें|

तो आइये अब पढ़ते हैं उस विशेष पंक्ति वाली पहली प्रस्तुति:-


घर में न हो तो सूना-सूना लगे घर ; कोई
चीज़ न ठिकाने मिले और चूल्हा जले ना !
मिले न कलाई में मरीज़ की तो बैद कहे
जान का है ख़तरा जो टाले से भी टले ना !
साथ न निभाए तो शरीर मुरझाए , और
दुनिया में घर भी किसी का फूले-फले ना !
जीवन-आधार नारी-नाड़ी’ ; स्वर्णकार कहे
काम जीव का कोई भी नारबिन चले ना

[राजेन्द्र भाई ने 'नार' शब्द के जो दो अर्थ लिए हैं उन में से एक है नारी / स्त्री और दूसरा
है नाड़ी| मंच की प्रार्थना पर आप ने अपना सर्वोत्तम प्रस्तुत कर के साबित किया है कि
आप छंदों को ले कर कितने संजीदा हैं| व्यक्तिगत रूप से मैं आप के इस प्रयास की
जितनी भी तारीफ करूँ कम होगी]




हर मंच का दायित्व होता है कि स्थापित रचनाधर्मियों के साथ साथ नवोदित एवम् स्थापित परंतु विधा विशेष में आरम्भिक प्रयास करने वाले कवि / कवियात्रियों को भी स-सम्मान स्थान दें| इस क्रम में अगली बार हम कुछ नये सदस्यों से मिलेंगे और उन के प्रयासों को पढ़ेंगे| जिन सदस्यों को अपने छन्दों में कुछ सुधार की ज़रूरत लग रही हो, वे जल्द से जल्द नये छन्द भेजने की कृपा करें|

आप सभी राजेन्द्र भाई के कल्पना लोक की सैर करें और ये अद्भुत रचना संसार आप को कैसा लगा, टिप्पणियों के माध्यम से व्यक्त कर इस साहित्यिक आयोजन को वेग प्रदान करें, और हम वही करते हैं - एक और पोस्ट की तैयारी|

जय माँ शारदे!

अंतर श्लेष और यमक अलंकार के बीच

अक्सर देखा गया है है कि कई शोधार्थी यमक और श्लेष अलंकार के अंतर में ही उलझ के रह जाते हैं| दरअसल दोनों अलंकार एक दूसरे के विपरीत हैं| यथा :-

शब्द एक बार ही आए अर्थ अनेक हों तो श्लेष अलंकार होता है
शब्द एक से अधिक बार आए और अर्थ भी एक से अधिक हों तो यमक अलंकार होता है


श्लेष अलंकार :-

आइये पहले उदाहरण के द्वारा श्लेष अलंकार को समझने का प्रयास करते हैं|

प्रसिद्ध कवि रहीम जी का एक दोहा लेते हैं :-


रहिमन पानी राखिये,बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरै, मोती मानुष चून।
इस दोहे में कही गई बात बिलकुल साफ है| यदि पानी नहीं तो मोती, मनुष्य और चून / आटे की कोई महत्ता नहीं| मोती के संदर्भ में पानी का अर्थ हुआ चमक, मनुष्य के संदर्भ में पानी का आशय हुआ रुतबा या कि फिर यूं कहो कि मान-सम्मान और चून / आटे के संदर्भ में तो ये पानी ही हुआ|


शब्द एक ही आए, एक बार ही आए पर अर्थ अनेक निकलते हों, तो वहाँ श्लेष अलंकार होता है| आचार्य संजीव वर्मा सलिल जी के शब्दों में:-
वक्ता- श्रोता जब करें, भिन्न शब्द के अर्थ
रचें श्लेष वक्रोक्ति कवि, जिनकी कलम समर्थ..

एक शब्द के अर्थ दो, करे श्लेष-वक्रोक्ति.
श्रोता-वक्ता हों सजग, समझें न अन्योक्ति..

जहाँ पर एक से अधिक अर्थवाले शब्द के प्रयोग द्वारा वक्ता का एक अर्थ पर बल रहता है किन्तु श्रोता का दूसरे अर्थ पर, वहाँ श्लेष वक्रोक्ति अलंकार होता है. इसका प्रयोग केवल समर्थ कवि कर पाता है चूँकि विपुल शब्द भंडार, उर्वर कल्पना शक्ति तथा छंद नैपुण्य अपरिहार्य होता है. उदाहरण के लिए मेरा एक दोहा भी देखिये :-

सीधी चलते राह जो, रहते सदा निशंक|
जो करते विप्लव, उन्हें, 'हरि' का है आतंक||

ऊपर के दोहे में प्रयुक्त 'हरि' शब्द के दो अर्थ हैं बंदर और ईश्वर - यह देखिये -
जो लोग सीधे चुप चाप रास्ते से निकल जाते हैं, वो निशंक रहते हैं यानि उन्हें कोई प्राबलम नहीं होती| पर जो विप्लव करते हैं यानि छेड़खानी करते हैं - वो ही बंदरों से आतंकित भी होते हैं|
जो लोग जीवन सीधे रास्ते जीते हैं उन्हें कोई भय नहीं| परंतु जो लोग विप्लवी होते हैं यानि कि सीधी राह नहीं चलते; हरि यानि ईश्वर का आतंक भी उन्हें ही होता है|
तो ये होता है श्लेष अलंकार| मेरा एक और छन्द देखिएगा:-


माना कि विकास, बीज - से ही होता है मगर
इस का प्रयोग किए- बिना, बीज फले ना|

इस में मिठास हो तो, अमृत समान लगे
खारापन हो अगर, फिर दाल गले ना|

इस का प्रवाह भला कौन रोक पाया बोलो
इस का महत्व भैया टाले से भी टले ना|

चाहे इसे पानी कहो, चाहे इसे ज्ञान कहो
सार तो यही है यार, 'नार' बिन चले ना||

इस छन्द में प्रयुक्त 'नार' शब्द के दो अर्थ हैं| पहला अर्थ है 'पानी' और दूसरा अर्थ है 'ज्ञान'| आप इस पूरे छन्द को दो बार पढ़ें, आप को लगेगा कि इस में कहा गया है कि पानी के बिना नहीं चलता / ज्ञान के बिना नहीं चलता| यही होता है श्लेष अलंकार का जादू| खासकर पूरे छन्द में जब सिर्फ एक ही शब्द के कारण पूरे के पूरे छन्द के दो अर्थ हो जाते हैं, तो ये एक जटिल काव्य कृति मानी जाती है| इसे विद्वतजन बहुव्रीहि समास कह कर भी संबोधित करते हैं|

और अब यमक अलंकार :-

एक शब्द एक से अधिक बार आए और अर्थ भी अलग अलग निकलें तो यमक अलंकार होता है| बहुत पुराना दोहा जो अमूमन हर साहित्य प्रेमी जानता है:-

कनक - कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय|
या खाएं बौराय जग, वा पाएँ बौराय|

यहाँ शब्द 'कनक' के दो अर्थ हैं| धतूरा और सोना / स्वर्ण| कवि कह रहा है कि धतूरे से ज्यादा मादक / नशीला है सोना| धतूरा खा कर आदमी बौराता है / पगलाता है परंतु सोना तो पाने के साथ ही बौरा जाता है|

यमक अलंकार का एक और उदाहरण भूषण कवि के कवित्त के माध्यम से:-

ऊंचे घोर मंदर के अंदर रहन वारी
ऊँचे घोर मंदर के अन्दर रहाती हैं।
कंद मूल भोग करें कंद मूल भोग करें
तीन बेर खातीं, ते वे तीन बेर खाती हैं।
भूषन शिथिल अंग भूषन शिथिल अंग,
बिजन डुलातीं ते वे बिजन डुलाती हैं।
‘भूषन’ भनत सिवराज बीर तेरे त्रास,
नगन जड़ातीं ते वे नगन जड़ाती हैं॥
अर्थ -
[1] ऊंचे घोर मंदर - ऊंचे विशाल घर-महल / ऊंचे विशाल पहाड़
[2] कंद मूल - राजघराने में खाने के प्रयोग में लाये जाने वाले जायकेदार कंद-मूल वगैरह / जंगल में कंद की मूल यानि जड़
[3] तीन बेर खातीं - तीन समय खाती थीं / [मात्र] तीन बेर [फल] खाती हैं
[4] भूषन शिथिल अंग - अंग भूषणों के बोझ से शिथिल हो जाते थे / भूख की वजह से उन के अंग शिथिल हो गए हैं
[5] बिजन डुलातीं - जिनके इर्द गिर्द पंखे डुलाये जाते थे / वे जंगल-जंगल भटक रही हैं
[6] नगन जड़ातीं - जो नगों से जड़ी हुई रहती थीं / नग्न दिखती हैं

यमक अलंकार का एक उदाहरण डा. सरोजिनी प्रीतम की आधुनिका कविता / हास्य क्षणिका से :-

तुम्हारी नौकरी के लिए कह रखा था,
सालों से,
सालों से।

एक दोहा मेरी तरफ से भी

आने वाले वक्त में, दुर्लभ होगी यार|
कर दे बुक अड्वान्स में, 'पिंगल' बुक दो चार|

मुझे लगता है कम से कम इस दोहे का अर्थ तो हर कोई समझ ही जाएगा| पिंगल बुक यानि पिंगल शास्त्र की वो किताब जिसमें तमाम छंदों के बारे में विस्तार से समझाया गया है| आने वाले समय में ऐसी पुस्तकें [बुक्स] आसानी से उपलब्ध नहीं होंगी, लिहाजा उन्हें अभी से ही बुक कर देना चाहिए|

चलते चलते एक बार फिर से दोहराते हैं:-

एक शब्द एक बार आए अर्थ अनेक हों तो श्लेष अलंकार
और
एक शब्द एक से अधिक बार आए और अर्थ भी एक से अधिक हों तो यमक अलंकार

[आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी के मार्गदर्शन और आशीर्वाद के साथ]

फिल्मी गानों में अनुप्रास अलंकार

'अनु' तथा 'प्रास' इन दो शब्दों के मेल से बनाता है शब्द अनुप्रास| 'अनु' का अर्थ है बार-बार और 'प्रास' का अर्थ है वर्ण / अक्षर| इस प्रकार अनुप्रास का शाब्दिक अर्थ हुआ कि जब एक अक्षर बार बार आए तो वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है| बहुचर्चित पंक्ति ही काफी है अनुप्रास अलंकार को समझने के लिए:-

चंदू के चाचा ने चंदू की चाची को चाँदनी चौक में चाँदी की चम्मच से चाँदनी रात में चटनी चटाई

इस पंक्ति में 'च' अक्षर के बार बार आने से यहाँ अनुप्रास अलंकार हुआ|


अनुप्रास अलंकार के भी कई भेद हैं, यथा:-

[१] छेकानुप्रास
[२] वृत्यानुप्रास
[३] लाटानुप्रास
[४] अंत्यानुप्रास
[५] श्रुत्यानुप्रास

अब इन को समझते हैं एक एक कर के|

छेकानुप्रास

किसी पंक्ति में एक से अधिक अक्षरों का बार बार आना

उदाहरण :-
नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए
बाकी जो बचा वो काले चोर ले गए

हिन्दी फिल्म के इस गीत में 'न' - 'र' - 'म' तथा 'क' अक्षरों की बारंबारता के लिए छेकानुप्रास अलंकार का आभास होता है|


वृत्यानुप्रास

किसी पंक्ति में एक अक्षर का बार बार आना

उदाहरण :-
चन्दन सा बदन, चंचल चितवन

हिन्दी फिल्म के इस गीत में 'च' अक्षर की बारंबारता के लिए वृत्यानुप्रास अलंकार का आभास होता है|

लाटानुप्रास

किसी पंक्ति में एक शब्द का बार बार आना

उदाहरण :-

आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ

हिन्दी फिल्म के इस गीत में 'आदमी' शब्द की बारंबारता के लिए लाटानुप्रास अलंकार का आभास होता है|


अंत्यानुप्रास

सीधे सादे शब्दों में कहा जाये तो पंक्ति के अंत में अक्षर / अक्षरों की समानता को अंत्यानुप्रास कहते हैं| दूसरे शब्दों में कहें तो छन्द बद्ध सभी कविताओं में तुक / काफिये के साथ अंत्यानुप्रास पाया जाता है| इस का महत्व संस्कृत के छंदों में अधिक प्रासंगिक है| यथा :-

श्रीमदभवतगीता का सब से पहला श्लोक

धर्मक्षेत्रे, कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव:|
मामका: पाण्डवाश्चैव, किमकुर्वत संजय||

आप देखें छन्द बद्ध होने के बावजूद इस में अंत में तुक / काफिया नहीं है| अब संस्कृत के एक और श्लोक को देखते हैं:

नमामि शमीशान निर्वाण रूपं
विभुं व्यापकं ब्रम्ह्वेद स्वरूपं
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाश माकाश वासं भजेहं

तो अब आप को स्पष्ट हो गया होगा कि अंत्यानुप्रास का महत्व कब और क्यों प्रासंगिक है| आज कल तो छन्द बद्ध रचनाएँ तुकांत होने के कारण अंत्यानुप्रास युक्त होती ही हैं| गज़लें तो सारी की सारी अंत्यानुप्रास के साथ ही हुईं [गैर मुरद्दफ वाली गज़लें छोड़ कर]|

कबीरा खड़ा बजार में मांगे सबकी खैर|
ना काहू से दोसती, ना काहू से बैर||

ऊपर के दोहे की दोनों पंक्तियों के अंत में 'र' अक्षर आने के कारण अंत्यानुप्रास अलंकार हुआ| अंत्यानुप्रास के कुछ और उदाहरण :-

आए हो मेरी ज़िंदगी में तुम बहार बन के|
मेरे दिल में यूं ही रहना, तुम प्यार प्यार बन के||

चौदहवीं का चाँद हो या आफ़ताब हो|
जो भी हो तुम ख़ुदा की क़सम लाज़वाब हो|

संस्कृत श्लोकों के अलावा आधुनिक कविता में अंत्यानुप्रास की प्रासंगिकता उल्लेखनीय हो जाती है, यथा :-

ऑस की बूंदें
हासिल हैं सभी को
बिना किसी भेद भाव के
बराबर
निरंतर
यहाँ पर
वहाँ पर

श्रुत्यानुप्रास

इसे समझने से पहले समझते हैं कि एक वर्ग के अक्षर कौन से होते हैं| जैसे क-ख-ग-ग एक वर्ग के अक्षर हुए| च-छ-ज-झ एक वर्ग के अक्षर हुए| ट-ठ-ड-ढ एक वर्ग के अक्षर हुए|

जब किसी एक वर्ग के अक्षर बार बार आयें तो वहाँ श्रुत्यानुप्रास अलंकार होता है|

उदाहरण :-

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा, जैसे खिलता गुलाब, जैसे शायर का ख़्वाब 

हिन्दी फिल्म के इस गीत में एक ही वर्ग के कई अक्षर जैसे कि 'क' 'ख' 'ग' अक्षरों के आने से श्रुत्यानुप्रास अलंकार का आभास होता है| एक और उदाहरण:-

दीदी तेरा देवर दीवाना - 'द' - 'त' व 'न' एक ही वर्ग से हैं इसीलिए यहाँ श्रुत्यानुप्रास अलंकार हुआ|


आशा करते हैं कि हिन्दी फिल्मों के गानों के माध्यम से अनुप्रास अलंकार के विभिन्न रूपों की ये व्याख्या आप को पसंद आएगी| फिर मिलेंगे| नमस्कार|

[आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी के मार्गदर्शन और आशीर्वाद के साथ]

गुरुवार, 9 जून 2011

चौथी समस्या पूर्ति - घनाक्षरी - दुनिया को ताज लगे, उसे मुमताज लगे


सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन



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घनाक्षरी छंद के बारे में हम ने एक बात नोट की| पढ़ कर समझने की बजाय जब लोगों ने इस को औडियो क्लिप के जरिये सुना तो तपाक से बोल उठे अरे ये तो वो वाला है, हाँ मैंने सुना है इसे, अरे मैं तो जानता हूँ इसे| इस तरह की बातों को ध्यान में रखते हुए हम घोषणा के वक्त दी गयी औडियो क्लिप्स को दोहराना जारी रखते हैं:-




तिलक भाई द्वारा गाई गई रचना श्री चिराग जैन जी की है, और कपिल द्वारा गाई गई - मेरी|
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मुंबई में बरखा रानी की कृपा हो गयी और भाई हमने भी उस का स्वागत आलू के पराठों के साथ कर दिया है| कल गंगा दशहरा है - गंगा स्नान की प्रथा है, नाशिक जाएँगे - राम घाट पर स्नान करने| हालांकि बदलते समय के साथ नदियों का स्वरूप बदला है, पर श्रद्धा और आस्था भी अपनी जगह है भाई| पश्चिमी सभ्यता के लिए हर जगह सब कुछ एडजस्ट कर लेते हैं हम; तो अपने संस्कारों के लिए थोड़ा बहुत क्यूँ नहीं? फिर रविवार को एकादशी है तो उस दिन इच्छा है त्र्यंबकेश्वर दर्शन की|

आलू के पराठों की याद आते ही याद आ जाता है पंजाबी लहजा| तो ठेठ पंजाबी लहजे वाले और काव्य के किसी भी प्रारूप में भाषाई चौधराहट को सिरे से नकारने वाले योगराज प्रभाकर जी के घनाक्षरी कवित्तों के मजे लेते हैं आज| योगराज जी ने श्रंगार रस वाली पंक्ति को ताजमहल संदर्भित प्रेम से जोड़ कर अभिनव प्रस्तुति दी है| सामान्यत: श्रंगार रस का नाम आते ही हम लोग रीति काल की कल्पना करने लगते हैं या फिर बिहारी, सूरदास, तुलसी, केशव, सेनापति और घनानन्द जैसे तमाम कवियों द्वारा रचित काव्य का स्मरण करने लगते हैं| दरअसल श्रंगार रस का क्षेत्र काफी वृहद है और अब तो इंटरनेट पर उपलब्ध भी है, सो हम यहाँ उस विशाल शास्त्र की तरफ सिर्फ इंगित करते हुए आगे बढ़ते हैं|






हरेक दीवार तोड़, एक छत नीचे आ के ,
छोटी मोटी बातें खुद, बैठ निपटाइए|

अपना ये घर टूटे, सब इसी ताक में है,
इसे टूटने न देंगे, कसम ये खाइए |

खोलो ऑंखें समझ लो, दुशमन के मंसूबे,
उसके भुलावे में न, हरगिज़ आइए |

फूट पड़ी घर में तो, घर बच पायेगा न,
राजनीति का अखाड़ा, घर न बनाइए ||

[फूट पड़ी घर में तो............. 'मुख्य पंक्ति' को यथार्थ के काफी करीब ले गए हैं आप|
'वसुधेव कुटुम्बकम' को समर्पित इस पंक्ति पर आप ने वाकई जबर्दस्त प्रस्तुति दी है]


देख रूप रंग तेरा, सुध बुध भूले सभी,
तेरे इस रूप ने तो, जग भरमाया है |

ताब तेरी झेल पाना, आदमी के बस कहाँ,
देख तेरी सुन्दरता, चाँद भी लजाया है |

रूप का खज़ाना रख, यमुना के तीर पर,
मालिक ने प्रेमियों को, तो'फ़ा भिजवाया है |

दुनिया को ताज लगे, उसे मुमताज लगे,
जिस प्रेमी बादशा' ने, तुझको बनाया है ||

[इस छन्द ने तो 'मुख्य पंक्ति' से ऊपर चढ़ कर बात कही है भाई| और इसे ही कहते हैं कवि की
कल्पना| मुझे लगता है इस छन्द की तारीफ़ आप लोग मुझ से बेहतर करेंगे]



शरमाये काला तवा, बन्नो का दरश कर
लगे जैसे नैरोबी से आई कोई नार है |

कौवा जैसे निकला हो भींज कर चूने में से,
बन्ने की सूरत पे भी, ऐसा ही निखार है |

सीढ़ी लगवायी जब, जयमाल डालने को,
बन्नो जी को तब हुआ, बन्ने का दीदार है |

बन्नो जया भादुरी का, एक बटा तीन लगे,
बन्ने का बदन जैसे, क़ुतुब मीनार है ||

["जया भादुरी का एक बटा तीन" बाप रे बाप कैसी कैसी कल्पनाएं आ रही हैं -
यार खुश कर दित्ता|]



अंग्रेज़ियत के रंग में अमूमन रँग चुके आज के दौर में ऐसे छंदों को पढ़ने का आनंद ही और है| 'विशेष पंक्ति' वाले छन्द पर काम करने वाले कवियों की संख्या अब हो गई है तीन| आप लोग आनंद लीजिएगा योगराज जी के छंदों का, और हाँ, अपनी बहुमूल्य राय देना न भूलें प्लीज| तब तक हम तैयारी करते हैं एक और धमाकेदार पोस्ट की|

जय माँ शारदे!

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