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शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

तीसरी समस्या पूर्ति - कुण्डलिया - छठी किश्त - सुंदरियाँ इठला रहीं रन-वर्षा के साथ

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

समस्या पूर्ति मंच द्वारा कुण्डलिया छन्द पर आयोजित इस आयोजन में अब तक हम सरस्वती पुत्रों के २५ कुण्डलिया छन्द पढ़ चुके हैं| अब पढ़ते हैं दो और सरस्वती पुत्रों को| भाई दिलबाग विर्क जी पहली बार इस आयोजन में शामिल हुए हैं और छन्द साहित्य में उन का रुझान देखते हुए आशा बँधती है कि और भी कई कवियों से आने वाले समय में और भी सुन्दर सुन्दर छन्द पढ़ने को मिलेंगे| आदरणीय बृजेश त्रिपाठी जी ने भी अस्वस्थता के बीच समय निकाल कर अपने छन्द भेजे हैं| मंच इन दोनों का सहृदय आभार प्रकट करता है|




कम्प्यूटर से सीखिये , मुन्ना ज्ञान-विज्ञान |
पढ़ पाओगे आप यूँ , पहले से आसान ||
पहले से आसान, पढ़ाई हो जाएगी|
विद्वानों के साथ, भेंट भी हो पाएगी|
करो सही उपयोग , बनाओ इसे न बदतर|
कहत ' विर्क ' कविराय ,सहायक है कम्प्यूटर|१|
[अध्यापक महोदय अब हमें विश्वास है कि आप अपने शिष्यों को छन्द ज्ञान अवश्य देंगे]


भारत देश महान का , तुम खुद समझो हाल |
कूड़ा करकट बीनते , नौनिहाल बेहाल ||
नौनिहाल बेहाल ,झेलते हैं लाचारी |
मिले नहीं उपचार , गरीबी बनी बिमारी|
'विर्क' समझ ना पाय, विश्व के आगे - क्यूँ? नत!!!
दया-धर्म का दूत , जगद गुरु अपना भारत |२|
[पीड़ा को सही शब्द प्रदान किए हैं आपने]

:- दिलबाग विर्क






सुंदरियाँ इठला रहीं, रन वर्षा के साथ |
चौका-छक्का जब लगे, उछलें दो दो हाथ||
उछलें दो दो हाथ, तभी बालर खिसियाते|
फील्डिंग करके चुस्त,एक दो विकिट उड़ाते|
नहीं व्यर्थ हों बोर, कभी दर्शक मंडलियाँ|
शामिल कीं इस हेतु, मेच में ये सुंदरियाँ|१|
[अंकल आप भी देखते हैं २०-२० मेच!!!!!!!! और !!!!!!!!!!]


भारत ने फिर धार कर, विश्व-विजय का ताज|
आनंदित, फिर, कर दिया, सारा देश समाज||
सारा देश समाज , टीम का मोहक चहरा|
माही औ युवराज, सचिन, भज्जी औ नहरा|
'व्यथित आस' कर पूर्ण, विरोधी को कर गारत|
किया 'विश्व-कप' नाम, ख़ुशी से रोया भारत|२|
[सच में त्रिपाठी जी अमूमन हर हिन्दुस्तानी की आँखें नम हो आयीं थीं उस वक्त]


कम्पुटर कब गजवदन ,कब माउस में शक्ति|
पत्नी को नाराज़ कर, फिर भी पाली भक्ति||
फिर भी पाली भक्ति, घराणी हुई उपेक्षित|
कुंठित मन की रिक्ति, नहीं पा सकी अपेक्षित|
व्यथित प्रिया यदि मित्र, रहें खुशियाँ भी हटकर|
ये ना ठीक सलाह , ज़रा त्यागो कम्प्यूटर |३|
[तजुर्बे की बात कह रहे हैं त्रिपाठी जी]
:- बृजेश त्रिपाठी

इन दोनों सरस्वती पुत्रों को पढने के बाद अब हम प्रतीक्षा करते हैं अन्य साहित्य के उपासकों के छंदों के आने की| तब तक आप सभी इन साहित्य सुमनों की सुगंध से सराबोर हो कर अपनी टिप्पणियाँ इन पर न्यौछावर कीजिएगा |

जय माँ शारदे!!!

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

तीसरी समाया पूर्ति - कुण्डलिया - सुंदरियाँ ये ब्लॉग्स की ! वल्लाऽऽ ! ग़ज़ब रुआब

सभी साहित्य रसिकों का पुन: सादर अभिवादन


पिछली पोस्ट डरते डरते डाली थी, सोचा मित्रों को कुछ अनुचित न लग जाए, परन्तु सकारात्मक परिणाम मिलने से अब चैन की साँस मिली| आइये आज पढ़ते हैं बीकानेर वाले राजेन्द्र भाई के कुण्डलिया छन्दों को| बीकानेर की भुजिया की तारी'फें तो बहुत सुनी थीं, पर वहाँ की सुन्दरियाँ भी इत्ती सो'णी होती हैं, अब राजेन्द्र भाई को पढ़ कर पता चला| भाई किसी को इत्तेफाक न हो तो वो भी पढ़ के देख ले :-




सुंदरियाँ ये ब्लॉग्स की

सुंदरियाँ ये ब्लॉग्स की ! वल्लाऽऽ ! ग़ज़ब रुआब|
दिल से मैं करता इन्हें… अदब सहित आदाब||
अदब सहित आदाब ; ख़ूब दिखलातीं ये दम|
घर-ऑफिस के साथ नेट पर गाढें परचम|
'स्वर्णकार' कविराय, मुग्ध पढ-पढ टिप्पणियाँ|
धन्य ‘शब्द स्वर रंग’ - पधारें जब सुंदरियाँ|१|
[मालुम पड़ रहा है भइये, ब्लोग्स की सुन्दरियाँ यदि नाराज हो जाएँ तो आप ही झेलना]


सुंदरियाँ सो’णी लगें

सुंदरियाँ सो’णी लगें, जब वे डालें घास|
वरना क्या है ख़ास ? सब - लगती हैं बकवास||
लगती हैं बकवास ; घमंडिनि-दंभिनि सारी|
प्रौढ़ा तरुणी और कामिनी कली कुमारी|
चांदी-सिक्के जेब - ठूँस, करिए रँगरलियाँ |
आगे-पीछे लाख-लाख डोलें सुंदरियाँ|२|
[भाभ्भीजी नें बतानो पड़ेग्गो]


केशर कली कटार

सुंदरियाँ नीकी लगें , मीठे उन के बैन|
अधर रसीले , मोहिनी - छवि, रतनारे नैन||
छवि रतनारे नैन ; निरख’ सुख-आनँद उपजै|
रचना सुंदर सौम्य - निरख प्रभु की, मन रीझै||
केशर कली कटार, कनक की कछु कामिनियाँ|
स्वर्णकार सुख देय, सहज सुवरण सुंदरियाँ|३|
[मार डाला पाप्पड वाले को यार]

तुम्हारे रूप के सामने - पानी भरें सुन्दरियाँ

सुंदरियाँ देखी यहाँ, हमने लाख हज़ार|
नहीं कहीं तुम-सी प्रिये! छान लिया संसार||
छान लिया संसार; सुंदरी तुम सुकुमारी|
छुई मुई की डाल ! सुशोभित केशर-क्यारी||
मंजरियों सी अंग-गंध ; कुंतल वल्लरियाँ|
सम्मुख तुम्‍हरे रूप - भरें पानी सुन्दरियाँ|४|
[शुक्रिया राजेन्द्र जी अपने विद्यार्थी काल के अनुभव साझा करने के लिए]

कम्प्यूटर

कम्प्यूटर जी आप तो, बहुत ग़ज़ब की चीज़|
करें भला ता’रीफ़ क्या, हम जैसे नाचीज़!!
हम जैसे नाचीज़ ; सभी की छुट्टी कर दी|
कोटि-कोटि का ज्ञान , भरा जिसकी क्या गिनती|
बड़ी ज़रूरत आप बने हर घर हर दफ़्तर|
तुमको लाख सलाम ! महाज्ञानी कम्प्यूटर|५|
[जय हो]

भारत मेरी जान है

भारत मेरी जान है , इस पर मुझको नाज़|
नहीं रहा बिल्कुल मगर, यह कल जैसा आज||
यह कल जैसा आज ; गुमी सोने की चिड़िया|
बहता था घी-दूध आज सूखी हर नदिया||
करदी भ्रष्टाचार - तंत्र ने, इसकी दुर्गत|
पहले जैसा, आज - कहाँ है? मेरा भारत|६|
[सही बन्धु एक दम सही]


आंखें फड़कें देख कर सुंदरियाँ


सुंदरियाँ इक साथ जब, दिख जातीं दो – चार|
बढ़ती दिल की धुकधुकी, चढ़ता सर्द बुखार||
चढ़ता सर्द बुखार; बचाना तू ही रब्बा|
लग ना जाए आज कहीं इज़्ज़त पर धब्बा|
देखी हैं हर ठौर, टूटती टाँग-खुपडियाँ|
जब जब फडकें आँख - देख - सो'णी सुंदरियाँ|७|
[चलो देर आयद दुरुस्त आयद, अब भाभ्भीजी को नहीं बतान्ग्गो]

-राजेन्द्र स्वर्णकार

भारतीय छन्द साहित्य की सेवा स्वरूप शुरू किये गए इस आयोजन में आप सभी के अनमोल सहयोग के लिए एक बार फिर से आभार| इस आयोजन को आगे बढाने के लिए आप लोगों से फिर से सविनय निवेदन है कि अपने अपने छन्दों को सुधार कर यथाशीघ्र भेजने की कृपा करें| जिन लोगों ने अब तक नहीं भेजें हैं, वो भी अब अपने छन्द भेजने की कृपा करें| मथुरा जाने से पहले, कुण्डली छन्द पर आयोजित इस तीसरी समस्या पूर्ति का समापन करने का विचार है ताकि उस के बाद घनाक्षरी कवित्त पर चर्चा आरम्भ की जा सके|

रविवार, 24 अप्रैल 2011

कुण्डलिया छन्द - मेरी भूल और उस का सुधार

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

दोहा के बाद रोला छोड़ कर सीधे कुण्डलिया छन्द पर आने का फायदा तो ये हुआ कि कई सारे कवियों ने अपनी रचनाएं ताबडतोब भेज दीं, और हानि ये हुई कि हम रोला छन्द से साक्षात्कार नहीं कर पाए| खैर, उसे अब दुरुस्त कर लेते हैं| मैं इस पोस्ट में अपनी भूल और उस के सुधार के बारे में चर्चा कर रहा हूँ| हालांकि मैं भी कई वर्षों तक काका हाथरसी टाइप छन्द को ही लिख रहा था, पर जब अग्रजों ने स्नेह और अधिकार के साथ कहा कि जब तुम लिख सकते हो गिरिधर कविराय वाले प्रारूप में तो फिर लिखो| अपने बड़ों की आज्ञा मानते हुए इस आयोजन की घोषणा के वक्त भी इसीलिए उदहारण भी दिए थे|

आगे पढ़ने से पहले हम एक छोटी सी चर्चा कर लेते हैं यति, प्रवाह वगैरह के बारे में| जब किसी वाक्य या छन्द के चरण विशेष में - शब्द / वर्ड; [अक्षर / लेटर] नहीं; विशेष के बाद हमारी ध्वनि विश्राम पाती है, यानि हम बोलते बोलते क्षण भर रुक कर आगे बढ़ते है, तो वाक्य में शब्द के उस अंत को 'यति' कहा जाता है| उदाहरण के लिए ये देखिये:-


कबिरा खड़ा बजार में, माँगे सबकी खैर||
ना काहू से दोसती, ना काहू से बैर||

आप इसे सिर्फ पढ़ें नहीं, बोलते हुए पढ़ें| आप पाएंगे कि पहले चरण में 'में' के बाद, दूसरे चरण में 'खैर' के 'र' पर, तीसरे चरण में 'दोसती' के 'ती' पर और चौथे चरण में 'बैर' के 'र' पर यति है|

और अब बात करते हैं कि दोहा के पहले और तीसरे चरण के अंत में लघु और गुरु क्यूँ जरुरी है:-

ऊपर के दोहे के पहले / तीसरे चरण को यूँ बोलते हुए पढ़ के देखो

बजार में खडा कबिरा
दोसती काहू से ना
दोसती ना काहू से

इन तीनों चरणों में मात्राओं की संख्या १३ होने के बावजूद ये अशुद्ध हैं, आप अब तक इस बात को पकड़ चुके होंगे| दोहे के पहले और तीसरे चरण के अंत में यदि एक लघु और एक गुरु के स्थान पर तीन लघु भी लिए जाएँ तो भी काम चलता है, पर याद रहे कि उन तीन लघुर में से अंत के दो लघु एक दीर्घ का आभास कराएँ| कुछ उदाहरण:-

कृपया बोलते हुए पढ़ें :-

मैं तेरा करता मनन
['म' के बाद 'नन' दीर्घ का आभास करा रहे हैं]

पा जाऊँ तुझको अगर
[अ' के बाद 'गर' दीर्घ का आभास करा रहे हैं]

कहता हूँ तुझ से कि चल
['कि' के बाद 'चल' दीर्घ का आभास करा रहे हैं]

आगे बढ़ के फिर न हट
['न' के बाद 'हट' दीर्घ का आभास करा रहे हैं]

तू है मेरा हमसफ़र
['हम' के बाद 'स' लघु का और इस के बाद 'फर' दीर्घ का आभास करा रहे हैं]


और अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर|

आज हिन्दुस्तान की किरकेट दुनिया जहान में अपना परचम फहरा चुकी है| पर एक दौर वो भी था जब हमारा सर शर्म से झुका हुआ था, और तमाम क्रिकेट प्रेमी किंकर्त्तव्यविमूढ वाली अवस्था को प्राप्त होने लगे थे| इस दौर के कुछ नाम याद होंगे आप लोगों को भी - मसलन - मोंगिया, जडेजा, मनोज प्रभाकर, अज़हरुद्दीन और लेले आदि| उसी दौरान मैंने ये छन्द लिखा था:-

सच्ची बात बता रहा, मान सके तो मान|
सौ करोड़ की भीड़ में, मिले न ग्यारह ज्वान||
मिले न ग्यारह ज्वान, दुर्दशा देखो प्यारे|
अक्सर ही, हम जीत चुके, मैचों को हारे|
कैसे भला खिलाड़ी कोई खुल कर खेले|
'लेले' जब कहता फिरता हो, 'ले-ले'.... 'ले-ले'......||

अब लेते हैं इस छन्द का विन्यास कुण्डलिया छन्द के अनुसार :-

सच्ची बात बता रहा,
२२ २१ १२ १२ = १३ मात्रा - परफेक्ट
मान सके तो मान|
२१ १२ २ २१ = ११ मात्रा - परफेक्ट
सौ करोड़ की भीड़ में,
२ १२१ २ २१ २ = १३ मात्रा - परफेक्ट
मिले न ग्यारह ज्वान||
१२ १ २११ २१ = ११ मात्रा - परफेक्ट
मिले न ग्यारह ज्वान,
१२ १ २११ २१ = ११ मात्रा - परफेक्ट
दुर्दशा देखो प्यारे|
२१२ २२ २२ = १३ मात्रा - परफेक्ट
अक्सर ही, हम जीत
२११ २ ११ २१ = ११ मात्रा - परफेक्ट , ११ वीं मात्र पर लघु के साथ यति भी है
चुके, मैचों को हारे|
१२ २२ २ २२ = १३ मात्रा - परफेक्ट
कैसे भला खिलाड़ी
२२ १२ १२२ = १२ मात्रा ग़लत
कोई खुल कर खेले|
२२ ११ ११ २२ = १२ मात्रा ग़लत
'लेले' जब कहता
२२ ११ ११२ = १० मात्रा ग़लत
फिरता हो, 'ले-ले'.... 'ले-ले'......||
११२ २ २ २ २ २ = १४ मात्रा ग़लत

आपने देखा रोला में बड़ी ग़लतियाँ हैं, पंक्ति के पहले भाग में ११ वीं मात्रा पर लघु के साथ यति भी नहीं है| इस के अलावा छन्द के पहले और अंतिम शब्द में समानता भी नहीं है|

और अब बोलते हुए पढियेगा इसी छन्द को सुधारे हुए रूप में और स्वयँ इस की मात्रा गिनती, यति विराम वगैरह भी चेक कीजिएगा, आप ही खुद-ब-खुद| और यदि इस में ग़लती हो तो मुझे जरुर बताइएगा|

ले दे कर ये बात है, मान सके तो मान|
सौ करोड़ की भीड़ में, मिले न ग्यारह ज्वान||
मिले न ग्यारह ज्वान, दुर्दशा देखो प्यारे|
अक्सर ही, हम जीत चुके, मैचों को हारे|
कौन भला फिर यार देश की खातिर खेले|
'लेले' जब चिल्लाय कि भइये 'ले-ले'.... 'ले-ले'......||


मेरे सभी अग्रज, अनुज और हमउम्र साथियो, मैंने अपनी एक भूल और उस का सुधार आप सभी के साथ साझा किया है और उन सभी रचनाकारों, जिनके छन्द सुधार माँग रहे हैं, से फिर से विनम्र निवेदन करता हूँ कि कृपया सुधार कर के भेजने की कृपा करें|

मेरी ई बुक जिन लोगों ने नहीं पढ़ी हो, वो यहाँ क्लिक कर के वहां पहुँच सकते हैं

वैसे कुछ दिनों में इसका पीडीऍफ़ फोर्मेट भी उपलब्ध हो जाएगा

पुस्तक पर आप के अनमोल सुझावों, आप के आशीर्वाद के साथ साथ .................. पेंडिंग छन्दों में सुधार की भी अपेक्षा है ............

नमस्कार

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

तीसरी समस्या पूर्ति - कुण्डलिया - चौथी किश्त

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

दरअसल, पिछले कुछ दिनों से अपनी पहली पहली किताब को ले कर उलझा हुआ था| कई सारे छोटे छोटे काम पेंडिंग थे| अब कुछ राहत की साँस लेने के क्षण आए तो हाजिरी लगाने आ गया आप के दरबार में| योजना के मुताबिक इस ई बुक की मुँह दिखाई इस सप्ताह के अंत तक हो जानी चाहिए|

भारतीय छन्द साहित्य की सेवा स्वरूप शुरू किए गए इस आयोजन की तीसरी समस्या पूर्ति की चौथी किश्त हाजिर है आप सभी के सामने| इस बार हम पढ़ते हैं अंतर्जाल पर हिन्दी साहित्य के लिए पूर्ण रूप से समर्पित आचार्य श्री संजीव वर्मा 'सलिल' जी को| आचार्य जी की आज्ञा के मुताबिक उनकी रचनाएँ [संदेश सहित] तद्स्वरूप प्रकाशित की जा रही हैं|






छंद पहचानिए:
इस छंद की कुछ रचनाएँ आप पूर्व में भी पढ़ चुके हैं. इसे पहचानिए.

भारत के गुण गाइए, मतभेदों को भूल.
फूलों सम मुस्काइये, तज भेदों के शूल..
तज भेदों के, शूल अनवरत, रहें सृजनरत.
मिलें अंगुलिका, बनें मुष्टिका, दुश्मन गारत..
तरसें लेनें. जन्म देवता, विमल विनयरत.
'सलिल' पखारे, पग नित पूजे, माता भारत..
*
कंप्यूटर कलिकाल का, यंत्र बहुत मतिमान.
इसका लोहा मानते, कोटि-कोटि विद्वान..
कोटि-कोटि विद्वान, कहें- मानव किंचित डर.
तुझे बना ले, दास अगर हो, हावी तुझ पर..
जीव श्रेष्ठ, निर्जीव हेय, सच है यह अंतर.
'सलिल' न मानव से बेहतर कोई कंप्यूटर..
*
सुंदरियाँ घातक; सलिल' पल में लें दिल जीत.
घायल करें कटाक्ष से, जब बनतीं मन-मीत.
जब बनतीं मन-मीत, मिटे अंतर से अंतर.
बिछुड़ें तो अवढरदानी भी हों प्रलयंकर.
असुर-ससुर तज सुर पर ही रीझें किन्नरियाँ.
नीर-क्षीर बन, जीवन पूर्ण करें सुंदरियाँ..

आप सभी आनद लें आचार्य जी के छंदों का और मुझे आशीर्वाद सहित आज्ञा दें ई बुक के बाकी काम काज निपटाने के लिए| जय माँ शारदे|

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

तीसरी समस्या पूर्ति - कुण्डलिया - तीसरी किश्त

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

कुण्डलिया छंद पर आयोजित तीसरी समस्या पूर्ति के तीसरे चक्र में प्रवेश कर रहे हैं हम| पिछले चक्र में हमने पढ़ा था दो नौजवान कवियों को, और आज हम पढने जा रहे हैं एक वरिष्ठ रचनाधर्मी को|

'तजुर्बे का पर्याय नहीं' कहावत को चरितार्थ करने वाले ये अग्रज साहित्य के लिए समर्पित हैं तथा साहित्य में आंचलिक शब्दों की जोरदारी से वकालत भी करते हैं| पिछले साल अंतरजाल पर आने के बाद के दिनों में इन के द्वारा कई जानकारियाँ हासिल हुई हैं इन पक्तियों के लेखक को, जिसके लिए आभार कहना अपर्याप्त होगा|

तो आइये पढ़ते हैं इन के द्वारा भेजे गए कुण्डलिया छन्दों को:-

[१]
कंप्यूटर के ज्ञान में, अपना स्थान विशेष|
अपना लोहा मानती, दुनिया सारी शेष||
दुनिया सारी शेष, करे इज्जत अफजाई|
नासा तक में यार, देश की धाक जमाई|
जग को किए प्रदान, ट्रबल के माहिर शूटर|
बेफिक्री से ताकि, चलें सारे कंप्यूटर||
[इण्डिया दा जवाब नहीं भइये, शक हो तो बिल गेट्स से पूछ कर देख लो]

[२]
सुन्दरियाँ जो आज की, करें प्रदर्शित अंग|
लोक लाज को भूल कर, कपडे पहनें तंग||
कपडे पहने तंग, देख कर लज्जा आए|
उन्नति ना ये, यार, इन्हें कोई समझाए|
लाज शर्म को भूल, अगर हो बैठी *उरियाँ|
देंगी सिर्फ़ कलंक, देश को ये सुंदरियाँ||
[* उरियाँ = निर्वस्त्र, क्या ठेठ पंजाबी लहजा है]

[३]
सुन्दरियाँ इस दौर की, हाँकें वायूयान|
देश कौम का विश्व में, ऊँचा करती मान||
ऊँचा करती मान, हरिक खित्ते में छाईं|
पूरा है विश्वास, पुरुष-साथी की नाईं|
अंदर से हैं आग, और बाहर फुलझरियाँ|
सीमा पर हथियार, चलातीं ये सुन्दरियाँ||
[सुन्दरियाँ अच्छे काम भी करती हैं, भाई मानना पड़ेगा| ये बातें कह कर आप ने सिक्के के सकारात्मक पहलू पर भी ध्यान खींचा है| और 'खित्ते' भी क्या शब्द ढूंढा है मालिक]

[४]
भारत सारे विश्व में, हीरा कोहेनूर|
कीरत अपने देश की, दुनिया में मशहूर||
दुनिया में मशहूर, राम लीला औ गीता|
मर्यादा पुरषोत्तम, लक्ष्मण जी, माँ सीता|
रहती दुनिया तलक, हमेशा रहे सलामत|
अमन चैन का दूत, देश ये अपना भारत||
[वाह क्या देश भक्ति है, अमन चैन का दूत........भाई इस पंक्ति को तो सेल्यूट मारना पड़ेगा]

[५]
कंप्यूटर भार्या-सखा, कंप्यूटर पित-मात|
युवा वर्ग को ये मिली, सुन्दर सी सौगात||
सुन्दर सी सौगात, नज़र हटने ना पावे|
भोजन बिन रह जाय, रहा इस बिन ना जावे|
मिले न पोकिट खर्च, भले बाईक, स्कूटर|
सर्वप्रथम दरकार, सभी को ही कंप्यूटर||
[सही कह रहे हैं योगराज जी, यही कहानी है आज घर घर की]
:- योगराज प्रभाकर

'कंप्यूटर' शब्द पर दो, 'सुन्दरियाँ' शब्द पर दो और 'भारत' शब्द पर एक इस तरह इन कुल 'पांच' कुण्डलियों पर आप लोग अपनी-अपनी राय जाहिर कीजिये तब तक हम तयारी करते हैं अगली पोस्ट की|

इस बार नए प्रस्तुतिकर्त्ताओं का तांता लगा हुआ है पर साथ ही पुराने प्रस्तुतिकर्त्ताओं में से कई सारे शायद किसी काम में व्यस्त हैं| कुछ रचनाधर्मियों की जिन रचनाओं पर सुधार की प्रार्थना की गयी है, उन की भी प्रतीक्षा है| आप सभी के सहयोग से यह आयोजन नए प्रतिमान गढ़ रहा है| आप सभी के सहयोग के लिए पुन: सविनय निवेदन करते हैं हम|

जो व्यक्ति यहाँ पहली बार पधारे हैं, उन के लिए घोषणा तथा कुण्डलिया छन्द सम्बंधित लिंक एक बार फिर से :-
कुंडली उर्फ कुण्डलिया छन्द - समस्या पूर्ति की घोषणा
कुण्डलिया छन्द का विधान उदाहरण सहित

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

तीसरी समस्या पूर्ति - कुण्डलिया - दूसरी किश्त

सभी साहित्य रसिकों का एक बार फिर से सादर अभिवादन| कुंडली छंद तो वाकई सब की पहली पसंद लग रहा है| कई सारे रचनाधर्मियों ने अपने कुण्डलिया छंद भेजे हैं| उन में से कुछ ने उन छन्दों को बदलने की खातिर रुकने के लिए आज्ञा भी दी है|

नई पीढी का इस आयोजन से जुड़ना और जुड़े रहना हमारे लिए गर्व की बात है| आइये आज पढ़ते हैं दो नौजवान कवियों को| नया खून है तो नया जोश और नयी सोच ले कर आये हैं ये दौनों साहित्य रसिक|
==========================================================

[१]
सुंदरियाँ जब जब हँसैं, बिजुरी भी शरमाय|
देख गाल की लालिमा, ईंट खाक हुइ जाय||
ईंट खाक हुइ जाय, आग लागै छानी में|
मछरी सब मरि जाँय, खेल जो लें पानी में|
कह ‘सज्जन’ कविराय, चलें जियरा पर अरियाँ|
नागिन सी लहरायँ, कमर जब भी सुंदरियाँ||
[मार डाला पापड वाले को यार धर्मेन्द्र भाई]

[२]
भारत की चिरकाल से, बड़ी अनूठी बात|
दुश्मन खुद ही मिट गए, काम न आई घात||
काम न आई घात, पाक हो चाहे लंका|
बजा दिया है आज, जगत में अपना डंका|
कह ‘सज्जन’ कविराय अहिंसा से सब हारत|
करते जाओ कर्म, सदा सिखलाता भारत||
[सौ फीसदी सही है बन्धु]

[३]
कम्प्यूटर का हाल भी, घरवाली सा यार|
दोनों ही चाहें समझ, दोनों चाहें प्यार||
दोनों चाहें प्यार बात दुनिया ना समझी|
दिखा रहे सब रोज यहाँ, अपनी नासमझी|
कह सज्जन कविराय, समझ औ’ प्रेम रहें गर|
सुख दुख में दें साथ, सदा भार्या कम्प्यूटर||
[ऐसा क्या!!!!!!!!!]
:- धर्मेन्द्र कुमार 'सज्जन'
==========================================================

[१]
सुंदरियाँ बहका रही, फेंक रूप का जाल |
इनके जलवे देख कर लोग होंय खुशहाल||
लोग होंय खुशहाल, वाह रे क्या माया है |
देह दिखा कर नाम कमाना रँग लाया है ||
कह "शेखर" कविराय, हुस्न छलकातीं परियाँ|
इंजन आयल बेच रहीं देखो सुंदरियाँ ||
[सुंदरियाँ और इंजन ओयल की सेल........भाई वाह]

[२]
भारत मेरा देश है इस पर मुझको नाज़ |
सबही ने मिलकर करी, इसकी दुर्गति आज ||
इसकी दुर्गति आज, हो रही संस्कृति धूमिल |
लुटती हैं मरजाद , देखकर तडपे है दिल ||
कह "शेखर" कविराय, बचा लो मित्र विरासत |
फिर से हो सिरमौर, विश्व में अपना भारत ||
[आमीन]
:- शेखर चतुर्वेदी
==========================================================
दौनों कवि बन्धु बहुत बहुत बधाई के पात्र हैं| आप सभी से प्रार्थना है कि आशीर्वाद देते हुए इन की हौसला अफजाई करें| ये ही वो पीढ़ी है जो छन्दों की विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुचायेगी|

एक और ख़ुशी की बात है कि इस मंच पर प्रकाशित रचनाओं के पाठकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की जा रही है| कितना अच्छा हो - यदि पाठक वृन्द अपने टिप्पणी रूपी पुष्पों की वर्षा भी करें| आप सभी इन पांच कुंडली छन्दों का अनंद लीजिये, तब तक हम अगली पोस्ट की तैयारी करते हैं| इस आयोजन संबन्धित अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें|

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

तीसरी समस्या पूर्ति - कुण्डलिया - पहली किश्त

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन
और

आप सभी के सक्रिय सहयोग से आज हम पदार्पण कर रहे हैं कुण्डलिया छंद पर केन्द्रित तीसरी समस्या पूर्ति के पहले चरण में| अग्रजों की राय का सुपरिणाम ये हुआ कि आशा के अनुरूप कई रचनाधर्मियों ने इस छंद के प्रति अपना रुझान व्यक्त किया है| कई सारी रचनाएँ प्राप्त हुई हैं, और कई सारी रचनाएँ मार्ग में हैं|

आइये श्री गणेश करते हैं भाई महेंद्र वर्मा जी के कुण्डलिया छंदों के साथ:-
कम्प्यूटर इस दौर की, सबसे अद्भुत खोज ।
करता सबका काम यह, गंगू हो या भोज ।।
गंगू हो या भोज, सभी हैं निर्भर इस पर ।
यत्र तत्र है वास, मकां हो या हो दफ्तर ।
कभी शिष्य बन जाय, कभी बन जाता ट्यूटर ।
सुख दुख का है साथ, बिरादर है कम्प्यूटर ।।

भारत माता की सुनो, महिमा अपरम्पार ।
इसके आंचल से बहे, गंग जमुन की धार ।।
गंग जमुन की धार, अचल नगराज हिमाला ।
मंदिर मस्जिद संग, खड़े गुरुद्वार शिवाला ।।
विश्वविजेता जान, सकल जन जन की ताकत ।
अभिनंदन कर आज, ध न्य है अनुपम भारत ।।

और इस के बाद पढ़ते हैं तिलक राज कपूर जी की कुण्डलिया

सुन्‍दरियॉं करने लगीं, कम्‍प्‍यूटर से वार|
अधरों से छुरियॉं चलें, नैनन चले कटार||
नैनन चले कटार, बहुत है विपदा भारी|
भारत को ना भाय, लगी ऐसी बीमारी|
कह 'राही' कविराय, नारियॉं बनीं मछरियॉं|
कम वस्‍त्रों में छाय, रहीं बन कर सुंदरियाँ||


और इस खेप के तीसरे और आखिरी कवि समीर लाल जी

भारत मेरा देश है, इस पर मुझको नाज़|
चुनी हुई सरकार में, भ्रष्टन का है राज||
भ्रष्टन का है राज सभी मिल कर के लूटें|
पकड़ जाँय औ तुर्त, सभी बाइज़्ज़त छूटें|
कहत कवी शरमाय, झूठ में इन्हें महारत|
हालत ऐसी मगर, देश ऊँचा है भारत||

कंप्यूटर के सामने, बैठो पाँव पसार|
खबरें पढ़िए, पत्नि से - आँख छुपा कर यार|
आँख छुपा कर यार, मांग टी, आहें भरिये|
ताकि कहे वो बस्स, और अब काम न करिए|
कह 'समीर' कविराय, सफल भइये ये मंतर|
पूँजो उस के पाँव, दिया जिसने कंप्यूटर||


कवियों की फोटो यथावत कॉपी पेस्ट किए हैं| ज्यादा जानकारी न होने की वजह से आकार वगैरह में कुछ खास नहीं कर पाया हूँ| शीघ्र मिलेंगे दूसरी खेप की कुंडलियों के साथ| तब तक आप इन छंदों का आनंद लें और इन पर अपनी बहुमूल्य टिप्पणी रुपिन पुष्पों की वर्षा करें|

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

कुंडली उर्फ कुण्डलिया छन्द - समस्या पूर्ति की घोषणा

एक बार फिर से सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

ये पिछली बार की होली और दोहा छंदों की वो अनवरत वर्षा तो सदा सदा के लिए स्मृति में दर्ज हो गयी| पिछली पोस्ट में हमने रोला छंद के बारे में बातें कीं| उस के बाद शास्त्री जी और पुर्णिमा जी ने सुझाव दिया कि भाई दोहा और रोला की चर्चा के बाद, रोला छन्द की बजाय सीधे कुंडली छंद पर ही रचनाएँ आमंत्रित करो ना......

बात तो दोनों ही अग्रजों ने सही कही| तो अलग से रोला छन्द की बजाय सीधे कूच करते हैं कुंडली उर्फ कुण्डलिया की तरफ| हमें नहीं लगता कि भारतीय जन-मानस के सबसे चहेते छंदों में से एक इस छंद के बारे में कुछ बताने की आवश्यकता है, फिर भी शास्त्री जी की आज्ञा के मुताबिक थोड़ा बहुत लिख देते हैं| और साथ ही इसी पोस्ट में समस्या पूर्ति की घोषणा भी कर देते हैं|

कुंडली उर्फ कुण्डलिया छन्द

प्रख्यात कवि 'गिरिधर' जी की कुण्डलियों से भला कौन अनभिज्ञ है| आइए उन की ही एक कुंडली को पढ़ते हैं और उसी कुण्‍डलिया के ज़रिए इस छन्‍द के विधान को समझते हैं|

साईं बैर न कीजियै; गुरु, पण्‍डित, कवि, यार|
२२ २१ १ २१२=१३/ ११ ११११ ११ २१=११
बेटा, बनिता, पौरिया, यज्ञ करावन हार||
२२ ११२ २१२ = १३ / २१ १२११ २१ = ११
यज्ञ करावन हार, राज मंत्री जो होई|
२१ १२११ २१ = ११ / २१ २२ २ २२ = १३
जोगी, तपसी, बैद, आप कों तपें रसोई|
२२ ११२ २१ = ११ / २१ २ १२ १२२ = १३
कहँ गिरिधर कविराय, जुगन सों यों चल आई|
११ ११११ ११२१ =११ / १११ २ २ ११ २२ = १३
इन तेरह कों तरह, दिएं बन आवै साईं||
११ २११ २ १११=११/ १२ ११ २२ २२ = १३

उपरोक्त कुण्‍डलिया को पढ़ कर प्रतीत होता है कि:

१. ये मात्रिक छन्‍द है|
२. पहली दो पंक्ति दोहा की हैं|
३. तीसरी से छठी पंक्ति रोला की हैं|
४. दोहे के आख़िरी चरण का रोला का प्रथम चरण बनना अनिवार्य|
५. रोला चार चरण का होता है| रोला छंद के बारे में जानकारी इस के पहली पोस्ट में दी हुई है ही| अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें|
५. कुण्‍डलिया के शुरू और अंत के शब्द समान होने चाहिए| प्राचीन काल से इस छन्‍द को यूँ ही लिखा गया है| जैसे कि गिरिधर कविराय जी की ऊपर की कुंडली में 'साईं' शब्द छन्द के शुरू और आखिर में आ रहा है|

और अब समस्या पूर्ति की घोषणा

इस बार समस्या पूर्ति की पंक्ति के बजाय हम ले रहे हैं तीन शब्द|
सभी सम्माननीय रचनाधर्मियों से सविनय निवेदन है कि वे अपनी रुचि के अनुसार किसी एक शब्द को ले कर एक या एक से अधिक शब्दों को लेते हुए एक से अधिक कुण्डलिया छन्द प्रस्तुत करें| जो भी शब्द लें वह उस कुंडली छंद के शुरू और आखिर में दोनों जगह आना चाहिए|

तीन शब्द :-
१. कम्प्यूटर
२. सुन्दरियाँ
३. भारत

सभी साहित्य रसिकों से सविनय निवेदन है कि वे अपनी अपनी रचनाएँ navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें|

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

उफ़ ये थर्टीफर्स्टेनिया और रोला छन्द पर चर्चा

उफ़ ये थर्टीफर्स्टेनिया| हर साल आता है और गुजर जाता है| ये भी जैसे कि एक पर्व बन चुका है, होली दीवाली की तरह| अधिकतर लोगों से जुड़ा होता है ये अलग अलग स्वरूपों में|

इस बार की होली यादगार होली रही| समस्या पूर्ति मंच पर 'होली का त्यौहार' बहुत जोरदार तरीके से मना| वातायन पर भी जहाँ एक ओर हिन्दी साहित्य के पितामह भारतेंदु हरीशचंद्र जी की ग़ज़ल पढ़ने को मिली वहीं दुष्यंत कुमार और धर्मवीर भारती जी के बीच का ग़जलिया पत्राचार भी उन दिनों की साहित्यिक नोंक झोंक की यादें ताज़ा करा गया| ठाले बैठे पर तो लालम लाल रंग थे ही|

आप सभी ने इस होली का मज़ा कइयों गुना बढ़ा दिया| वैसे तो हम में से ज़्यादातर, अभी क्रिकेट के महाकुंभ यानि कि वर्ल्ड कप के फाइनल मेच के ख़यालों में खोए हुए हैं उस के बाद भारतीय नववर्ष / संवत्सर आ रहा है| कई सारे दफ़्तरों में तो शनि / रवि / सोम छुट्टियों वाला माहौल है| उस के बाद मंगलवार ओन्वार्ड्स हम लोग रेगयुलर लाइफ की पटरी पर लौटेंगे, मोस्ट प्रोबेबली|

लगे हाथों कुछ बातों की शुरुआत कर देते हैं| जैसा क़ि हमने पहले भी व्यक्त किया क़ि अगली समस्या पूर्ति रोला छंद पर होने वाली है सो आइए बेसिक बातों की शुरुआत करते हैं रोला छंद की, बहुत ही संक्षेप में; और सभी विद्वत्जनों से फिर से सविनय अनुरोध करते हैं क़ि वे अपने अपने आलेख [रोला छन्द पर] प्रस्तुत करने की कृपा करें| उस के बाद हम घोषणा करेंगे समस्या पूर्ति की पंक्ति की|

रोला छंद

१. चार पंक्तियों वाला होता है रोला छंद
२. रोला छन्द की हर पंक्ति दो भागों में विभक्त होती है
३. रोला छन्द की हर पंक्ति के पहले भाग में ११ मात्रा अंत में गुरु लघु [२१] या लघु लघु लघु [१११] अपेक्षित
४. रोला छन्द की हर पंक्ति के दूसरे भाग में १३ मात्रा अंत में गुरु गुरु [२२] / लघु लघु गुरु [११२] या लघु लघु लघु लघु [११११] अपेक्षित| कई सारे विद्वानों का मत है क़ि रोला की पंक्ति की समाप्ति गुरु गुरु [२२] से ही होनी चाहिए|
५. रोला छन्द की किसी भी पंक्ति की शुरुआत में लघु गुरु लघु [१२१] के प्रयोग से बचना चाहिए, इस से लय में व्यवधान उत्पन्न होता है|

रोला छन्द के कुछ उदाहरण:-

हिंद युग्म - दोहा गाथा सनातन से साभार:-:-

नीलाम्बर परिधान, हरित पट पर सुन्दर है.
२२११ ११२१=११ / १११ ११ ११ २११२ = १३
सूर्य-चन्द्र युग-मुकुट, मेखला रत्नाकर है.
२१२१ ११ १११=११ / २१२ २२११२ = १३
नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल तारा-मंडल हैं
११२ २१ १२१=११ / २१ २२ २११२ = १३
बंदीजन खगवृन्द, शेष-फन सिंहासन है.
२२११ ११२१ =११ / २१११ २२११२ = १३


शिवकाव्य.कोम से साभार:-

अतल शून्य का मौन, तोडते - कौन कहाँ तुम|
१११ २१ २ २१ = ११ / २१२ २१ १२ ११ = १३
दया करो कुछ और, न होना मौन यहाँ तुम|
१२ १२ ११ २१ = ११ / १ २२ २१ १२ ११ = १३
नव जीवन संचार, करो , फिर से तो बोलो|
११ २११ २२१ = ११ / १२ ११ २ २ २२ = १३
तृषित युगों से श्रवण, अहा अमरित फिर घोलो||
१११ १२ २ १११ = ११ / १२ १११११ ११ २२ = १३

रूपचंद्र शास्त्री मयंक जी के ब्लॉग उच्चारण से साभार:-

समझो आदि न अंत, खिलेंगे सुमन मनोहर|
११२ २१ १ २१ = ११ / १२२ १११ १२११ = १३
रखना इसे सँभाल, प्यार अनमोल धरोहर|
११२ १२ १२१ = ११ / २१ ११२१ १२११ = १३


कवि श्रेष्ठ श्री मैथिली शरण गुप्त जी द्वारा रचित साकेत का द्वादश सर्ग तो रोला छन्द में ही है और उस की शुरुआती पंक्तियों पर भी एक नज़र डालते हैं:-

ढाल लेखनी सफल, अंत में मसि भी तेरी
२१ २१२ १११ = ११ / २१ २ ११ २ २२ = १२
तनिक और हो जाय, असित यह निशा अँधेरी
१११ २१ २ २१ = ११ / १११ ११ १२ १२२ = १३

इसी रोला छंद की तीसरी और चौथी पंक्तियाँ खास ध्यान देने योग्य हैं:-
ठहर तभी, क्रिश्णाभिसारिके, कण्टक कढ़ जा
१११ १२ २२१२१२ = १६ / २११ ११ २ = ८
बढ़ संजीवनि आज, मृत्यु के गढ़ पर चढ़ जा
११ २२११ २१ = ११ / २१ २ ११ ११ ११ २ = १३

तीसरी पंक्ति में यदि यति को प्रधान्यता दी जाए तो यति आ रही है १६ मात्रा के बाद| कुल मात्रा १६+८=२४ ही हैं| परंतु यदि हम 'क्रिष्णाभिसारिके' शब्द का संधि विच्छेद करते हुए पढ़ें तो यूँ पाते हैं:-

ठहर तभी क्रिश्णाभि-सारिके कण्टक कढ़ जा
१११ १२ २२१ = ११ / २१२ २११ ११ २ = १३

अब कुछ अपने मन से| छंद रचना को ले कर लोगों में फिर से जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से एकत्रित हो रहे हैं हम और आप यहाँ पर| हम में से कई सारे न सिर्फ़ बहुत ही सफलता से ग़ज़ल कह रहे हैं बल्कि उनकी तख्तियों को आसानी से समझ भी जाते हैं| एक्जेक्टली शायद न भी हो, पर कुछ कुछ ये नीचे दिए गये वज्ञ [काल्पनिक] भी रोला छंद लिखने में मदद कर सकते है, यथा:-

अपना तो है काम, छंद की बातें करना
फइलातुन फइलात फाइलातुन फइलातुन
२२२ २२१ = ११ / २१२२ २२२ = १३

भाषा का सौंदर्य, सदा सर चढ़ के बोले
फाईलुन मफऊलु / फईलुन फइलुन फइलुन
२२२ २२१ = ११ / १२२ २२ २२ = १३

रोला छन्द संबन्धित कुछ अन्य उदाहरणों के लिए यहाँ पर क्लिक करें :-



तख्तियों के जानकार इस बारे में और भी बहुत कुछ हम लोगों से साझा कर सकते हैं|

बहुत लंबा न खींचते हुए फिलहाल यहाँ विराम लेते हैं और इंतेज़ार करते हैं आप लोगों के विचारों का| कई सारे लोग सोनेट और रुबाई को भी रोला से जोड़ते हुए बातें करते हैं.......................................

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