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शनिवार, 19 नवंबर 2011

निज लक्ष्य जब तक सिद्ध ना हों, बेधड़क बढ़ते रहें

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन


हरिगीतिका छंद आधारित आयोजन के अगले चक्र में आज हम पढ़ते हैं आ. बृजेश त्रिपाठी जी को। बृजेश जी मंच से पहले से जुड़े हुए हैं और हम पिछले आयोजनों में इन की कुण्डलिया और घनाक्षरियाँ पढ़ भी चुके हैं।

बृजेश त्रिपाठी

संघर्ष दुष्कर ज़िन्दगी के, कँपकँपाते हैं हमें।
कर्तव्य पथ के शूल भी नित, डगमगाते हैं हमें।।

भटकें नहीं, हम सब, निरंतर, राह पर चलते रहें।
निज लक्ष्य जब तक सिद्ध ना हों, बेधड़क बढ़ते रहें।१।


इस हेतु ऋषियों ने रची थी, पर्व-उत्सव की प्रथा।
उपवास-व्रत उत्साह वर्धन, हम करें, संभव - यथा।।

उत्साह के अतिरेक में हम , गुम न हो जाएँ कहीं।
आओ विचारें आज हम सब, बैठ कर थोडा यहीं।२। 


अनुरोध है यह आप सब से, मान इसको लीजिए।
थोडा भुला कर 'आत्म-रति' को, बात सबसे कीजिए।।

जीवन कसौटी सत्यता की, बस यही अविराम हो।
अपने लिए सब कष्ट, अपनों - के लिए आराम हो।३।


'अपने लिए सब कष्ट - अपनों के लिए आराम हो' यह पंक्ति सीधे दिल पर चोट करती है। इस के अलावा 'आत्म-रति' यानि आत्म-मुग्धता की स्थिति से बचने की सलाह देते हुए त्रिपाठी जी ने ज़िंदगी के यथार्थ को शब्दों के ज़रिये बख़ूबी उकेरा है। अंतिम पंक्ति [अपने लिए सब कष्ट] में १६+१२ का विधिवत अनुपालन चाह कर भी हम लोग नहीं कर पाये। इसे हटा कर देखा भी, रोचकता कथ्य की खत्म होने लगती है। सीधे सरल शब्दों में इस पंक्ति का कथ्य - सर चढ़ कर बोल रहा है।  इस एक पंक्ति को यदि नज़र अंदाज़ कर दिया जाये तो हर पंक्ति में १६+१२ के विधान का विधिवत पालन हो रहा है।

आप आनंद लीजिये इन छंदों का, अपनी टिप्पणियों द्वारा सम्मान कीजिये फ़नकार का और हम तैयारी करते हैं अगली पोस्ट की।

जय माँ शारदे!

10 टिप्‍पणियां:

  1. कविता अच्छी लगी और उसका संदेश भी |बधाई
    पर मात्रा गिनते समय कुछ गलतफहमी हो रहा है |
    जैसे -अनुरोध है यह आप सब से ,
    ११२१ २ ११ २१ ११ २ =१६
    पर शुरू में -२२१२२ तो आया ही नहीं| कृपया समझाने का कष्ट करें

    उत्तर देंहटाएं





  2. आदरणीय बृजेश त्रिपाठी जी
    सादर प्रणाम !

    अच्छे छंद रचे हैं आपने …
    प्रेरक भी -
    भटकें नहीं, हम सब, निरंतर, राह पर चलते रहें
    निज लक्ष्य जब तक सिद्ध ना हों, बेधड़क बढ़ते रहें


    वाऽऽह्… !

    बधाई और मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

    उत्तर देंहटाएं
  3. @आदरणीया आशा अम्मा जी
    सादर प्रणाम !

    मुझे हार्दिक प्रसन्नता है कि आप छंद समझने के लिए वाकई जांचती - परखती रहती हैं ।
    #
    आप तह तक स्वयं ही पहुंच चुकी हैं
    अनुरोध है यह आप सब से ,
    ११२१ २ ११ २१ ११ २ =१६
    शुरू में ११२१ २ और २२१२ एक ही बात है ।
    १+१ = २ ही तो है :)

    शायद नवीन जी व्यस्त हैं …
    कोई कमी रही है मेरे समझाने में तो उम्मीद है वे और बेहतर बता पाएंगे ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. ब्रजेश त्रिपाठी जी !! बधाई!!
    संघर्ष दुष्कर ज़िन्दगी के, कँपकँपाते हैं हमें।
    कर्तव्य पथ के शूल भी नित, डगमगाते हैं हमें।।
    भटकें नहीं, हम सब, निरंतर, राह पर चलते रहें।
    निज लक्ष्य जब तक सिद्ध ना हों, बेधड़क बढ़ते रहें।१।
    बहुत सुन्दर और मश्वरे के रूप में कहा है -इस बात को अधिकारी भाव से सर्वश्री सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्सायन अज्ञेय जी ने कहा है --

    मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने
    मै कब कहता हूँ जीवन मरु नंदन कानन का कूल बने
    काँटा कठोर है तीखा है ,उसमे उसकी मर्यादा है
    मैं कब कहता हूँ वह घट्कर प्रांतर का ओछा फूल बने

    इस हेतु ऋषियों ने रची थी, पर्व-उत्सव की प्रथा।
    उपवास-व्रत उत्साह वर्धन, हम करें, संभव - यथा।।
    उत्साह के अतिरेक में हम , गुम न हो जाएँ कहीं।
    आओ विचारें आज हम सब, बैठ कर थोडा यहीं।२।

    अब सुन रहा हूँ गुज़रे ज़माने की चाप को
    भूला हुआ था देर से मै अपने आप को -स्जिकेब --यह उत्साह केअतिरेक्की अवस्था के बाद का चित्र है बहुत सुन्दर छन्द खा है आपने !


    अनुरोध है यह आप सब से, मान इसको लीजिए।
    थोडा भुला कर 'आत्म-रति' को, बात सबसे कीजिए।।
    जीवन कसौटी सत्यता की, बस यही अविराम हो।
    अपने लिए सब कष्ट, अपनों - के लिए आराम हो।३।

    बाँध लेगे क्या युझे यह मोम के बन्धन सजीले
    पंथ की कारा बनेगे तितलियों के पर रंगीले
    विश्व का क्रन्दन भुला देगी मधुप की एक गुनगुन
    क्या भिगो देगे तुझे ये फूल के पर ओस गीले ..
    तू न अपनी विजय को अपने लिये कारा बनाना ...... (महादेवी जी की यह पंक्तियाँ स्वातंतेत्तर भारत की पाश्चातय उन्मुख पीढी के लिये आज भी सन्देस है ..... लेकिन ब्रजेश जी !!!!!! आपने "" अपने लिए सब कष्ट, अपनों - के लिए आराम हो """ यह पंक्ति कह कर दिल जीत लिया स्तब्ध कर दिया यह ह्रदय से निकली हुई पंक्तियाँ है यह वही व्यक्तिकह सकता है जिसने अपनो के लिये दर अस्ल समर्पण को जियाहै !!! वाह !!! वाह !! बहुत सुन्दर बहुत मर्मस्पर्शी !!

    उत्तर देंहटाएं
  5. ऊपर टाइपिंग की त्रुटियो को क्रपया अनदेखा करें -दूसरे छन्द में शायर का नाम शिकेब है और --"" बहुत सुन्दर छन्द कहा है "" --ऐसा पढें --मयंक

    उत्तर देंहटाएं
  6. राजेन्द्र जी बहुत आभारी हूँ की आपने समझा दिया है |मेरी तो यह धारणा बन रही थी की ,श्री राम चंद्र, की तरह वे ही शब्द लिए जाएँ जिन का क्रम २२१२२ हो |आपका बहुत बहुत आभार |
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत ही सुंदर छंद हैं बृजेश जी के, उन्हें कोटि कोटि साधुवाद इन छंदों के लिए और आखिरी पंक्ति के लिए अलग से बधाई स्वीकार करें।

    उत्तर देंहटाएं
  8. जीवन कसौटी सत्यता की, बस यही अविराम हो।
    अपने लिए सब कष्ट, अपनों - के लिए आराम हो।३

    bahut sundar chhand..

    उत्तर देंहटाएं
  9. सुन्दर छन्द...प्रेरक..


    ----११ भी २ है,, २ भी २ है....क्रपया ११२२..आदि को भूल जाइये.....,बस २८ मात्रा व १६-१२..अन्त मे लघु-गुरु ..ही याद रखिये...वही वास्तविक नियम है....

    उत्तर देंहटाएं
  10. @राजेन्द्र जी -

    आशा जी की शंका का निवारण कर के आप ने अपने मंच से जुड़े होने को सार्थक किया है। आभार।

    @आशा जी -

    श्री राम चंद्र के अलावा, 'वन्‍दहुँ विनायक', 'राहुल द्रविड़ द ग्रेट क्रिकेटर' तथा 'संसार उस के साथ है जिस को समय की फ़िक्र है ' जैसे उदाहरणों के माध्यम से हरिगीतिका छंद पर प्रकाश डाला गया था। गणेश वंदना में तो औडियो क्लिप भी दी थी ताकि इस की लय को आत्मसात किया जा सके। आप की बहन साधना जी भी आप से इस बारे में विचार विमर्श कर चुकी हैं। फिर भी जो शंका रह गई थी, आप ने पूछ लिया अच्छा किया। उम्मीद करता हूँ अब यह आप के लिए अधिक स्पष्ट है।

    @श्याम गुप्त जी

    हर छंद की अपनी एक लय होती है जिस के चलते वो छंद, 'वो' छंद होता है। मसलन 'सार / ललित छंद' का विधान भी है 16+12=28 मात्रा। कुछ गुणी जन इस के अंत में दो गुरु के स्थान पर दो लघु-एक गुरु या चार लघु की वकालत भी कर देते हैं। यदि उन की और आप की राय को जोड़ दें फिर तो हरिगीतिका और सार / ललित छंद में कुछ अंतर ही नहीं रह जाएगा।

    मेरा स्पष्ट मानना है कि हमें छंद शिल्प के मूल रूप से छेड़खानी करने से बचना चाहिए; प्रयोग के लिए अभिव्यक्ति, विवेचन, विषय वगैरह होते ही हैं हमारे पास। यदि छंद शिल्प को ले कर हमारे पास कुछ नए बेहतर विकल्प हों तो हम उन्हें अपना नाम दे सकते हैं। लोगों को हमारा तर्क सही लगेगा तो हमारा सुझाव आगे बढ़ेगा; अन्यथा प्रयोग बन कर रह जाएगा। मसलन 'कुण्डलिया छंद' के काका हाथरसी वाले प्रारूप को बहुतेरों ने 'छक्का' नाम दे दिया, पर मैंने इस प्रारूप को 'नव-कुण्डलिया छंद' नाम देना बेहतर समझा है। यदि लोगों को यह सही लगेगा तो वो इसे अपनाएँगे, अन्यथा ये बस मेरे पास ही रह जाएगा।

    @सलिल जी
    समय के साथ-साथ हमारी सोच में बदलाव आते हैं। और जब हम सही परिभाषा समझ लेते हैं, उस के बाद ग़लती करना 'सही' नहीं।



    आशा करता हूँ, अब कहीं कोई कन्फ़्यूजन रहा न होगा।

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