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गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

तीसरी समस्या पूर्ति - कुण्डलिया - दूसरी किश्त

सभी साहित्य रसिकों का एक बार फिर से सादर अभिवादन| कुंडली छंद तो वाकई सब की पहली पसंद लग रहा है| कई सारे रचनाधर्मियों ने अपने कुण्डलिया छंद भेजे हैं| उन में से कुछ ने उन छन्दों को बदलने की खातिर रुकने के लिए आज्ञा भी दी है|

नई पीढी का इस आयोजन से जुड़ना और जुड़े रहना हमारे लिए गर्व की बात है| आइये आज पढ़ते हैं दो नौजवान कवियों को| नया खून है तो नया जोश और नयी सोच ले कर आये हैं ये दौनों साहित्य रसिक|
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[१]
सुंदरियाँ जब जब हँसैं, बिजुरी भी शरमाय|
देख गाल की लालिमा, ईंट खाक हुइ जाय||
ईंट खाक हुइ जाय, आग लागै छानी में|
मछरी सब मरि जाँय, खेल जो लें पानी में|
कह ‘सज्जन’ कविराय, चलें जियरा पर अरियाँ|
नागिन सी लहरायँ, कमर जब भी सुंदरियाँ||
[मार डाला पापड वाले को यार धर्मेन्द्र भाई]

[२]
भारत की चिरकाल से, बड़ी अनूठी बात|
दुश्मन खुद ही मिट गए, काम न आई घात||
काम न आई घात, पाक हो चाहे लंका|
बजा दिया है आज, जगत में अपना डंका|
कह ‘सज्जन’ कविराय अहिंसा से सब हारत|
करते जाओ कर्म, सदा सिखलाता भारत||
[सौ फीसदी सही है बन्धु]

[३]
कम्प्यूटर का हाल भी, घरवाली सा यार|
दोनों ही चाहें समझ, दोनों चाहें प्यार||
दोनों चाहें प्यार बात दुनिया ना समझी|
दिखा रहे सब रोज यहाँ, अपनी नासमझी|
कह सज्जन कविराय, समझ औ’ प्रेम रहें गर|
सुख दुख में दें साथ, सदा भार्या कम्प्यूटर||
[ऐसा क्या!!!!!!!!!]
:- धर्मेन्द्र कुमार 'सज्जन'
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[१]
सुंदरियाँ बहका रही, फेंक रूप का जाल |
इनके जलवे देख कर लोग होंय खुशहाल||
लोग होंय खुशहाल, वाह रे क्या माया है |
देह दिखा कर नाम कमाना रँग लाया है ||
कह "शेखर" कविराय, हुस्न छलकातीं परियाँ|
इंजन आयल बेच रहीं देखो सुंदरियाँ ||
[सुंदरियाँ और इंजन ओयल की सेल........भाई वाह]

[२]
भारत मेरा देश है इस पर मुझको नाज़ |
सबही ने मिलकर करी, इसकी दुर्गति आज ||
इसकी दुर्गति आज, हो रही संस्कृति धूमिल |
लुटती हैं मरजाद , देखकर तडपे है दिल ||
कह "शेखर" कविराय, बचा लो मित्र विरासत |
फिर से हो सिरमौर, विश्व में अपना भारत ||
[आमीन]
:- शेखर चतुर्वेदी
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दौनों कवि बन्धु बहुत बहुत बधाई के पात्र हैं| आप सभी से प्रार्थना है कि आशीर्वाद देते हुए इन की हौसला अफजाई करें| ये ही वो पीढ़ी है जो छन्दों की विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुचायेगी|

एक और ख़ुशी की बात है कि इस मंच पर प्रकाशित रचनाओं के पाठकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की जा रही है| कितना अच्छा हो - यदि पाठक वृन्द अपने टिप्पणी रूपी पुष्पों की वर्षा भी करें| आप सभी इन पांच कुंडली छन्दों का अनंद लीजिये, तब तक हम अगली पोस्ट की तैयारी करते हैं| इस आयोजन संबन्धित अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें|

14 टिप्‍पणियां:

  1. सज्जन जी और शेखर जी दोनों की कुंडलीयां ला-जवाब है।

    नवीन जी आपके टप्पनी टैग भी उपर से दमदार है।

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  2. Anmol kundliyaan ke liye shekhar ji aur
    sajjan ji ko badhaaee .

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  3. वाह!! दोनों कवियों ने कमाल कर डाला...

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  4. kundaliyan bahut pasand aayi.. dusri sasya poorti par badhai... kal aapke yah Post charchamnch par hogi... aapka Abhaar

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  5. खूबसूरत।
    शेखर जी को पहली बार पढ़ा है, अच्‍छा लगा।
    धर्मेन्‍द्र जी की तो खूबसूरत ग़जलें भी पढ़ी हैं, खूब लिखते हैं।

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  6. धर्मेन्द्र जी और शेखर जी को दमदार कुंडलियों के लिए बधाई।

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  7. शेखर जी को सुंदर कुंडलियों के लिए हार्दिक बधाई तथा सुज्ञ जी, प्राण शर्मा जी, समीर लाल जी, मधुरन जी, कुसुमेश जी, नूतन जी, तिलक जी एवं महेन्द्र जी आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद हौसला अफ़जाई के लिए।

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  8. आधुनिक सन्दर्भों की अभिव्यक्ति कुंडलियों के माध्यम से सुनना बहुत अच्छा लगा ! काका हाथरसी जी की याद दिला दी आपने ! बहुत सुन्दर ! मेरा साधुवाद स्वीकार करें !

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  9. सज्जन जी को दमदार कुंडलियों के लिए बधाई। सुज्ञ जी, प्राण शर्मा जी, समीर लाल जी, मधुरन जी, कुसुमेश जी, नूतन जी, तिलक जी महेन्द्र जी एवं साधना जी आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद हौसला अफ़जाई के लिए।

    उत्तर देंहटाएं
  10. कुंडलिया छंद पर काफी लोग कलम आजमाई में लगे हुए हैं, लेकिन उन कुंडलियों को पढ़कर एक बासीपन का सा आभास होता रहा हैं ! वो ही पुराने ख्याल, वो ही आधे मन से लिखना ओर वो ही गंभीरता की कमी, कई दफा तो कुंडली और चुटकुले में फर्क करना ही मुश्किल हो जाता था ! लेकिन यहाँ इस मंच पर कुंडलियों को पढ़ा तो मुझे अपने इस विचार को त्यागना पड़ा ! इस दूसरी किस्त में प्रकाशित/सम्मिलित कुंडलियों में एक गजब की ताजगी, गंभीरता ओर नवीनता दिखी !

    भाई धर्मेन्द्र कुमार जी की कुंडलियाँ दिल को छूती हैं ! जहां उन्होंने छंद शिल्प के साथ पूरा न्याय किया वहीँ विचारों के स्तर पर भी तीनो कुंडलियाँ प्रभावित करती हैं ! इनमे ताजगी है, कोमलता है, संदेश है और गंभीरता भी है ! भाई शेखर चतुर्वेदी जी संभवत: मेरी तरह ही इस विधा से नए होने के बावजूद अपनी छाप छोड़ने में सफल रहे हैं ! उनकी दूसरी कुंडली (भारत मेरा देश है इस पर मुझको नाज़ |) दिल जीत कर ले गई ! मैं इन दोनों साथियों को दिल से मुबारकबाद देता हूँ, और भविष्य में भी ऐसे ही स्तरीय साहित सृजन की उम्मीद करता हूँ ! सनातन भारतीय छंद विद्या को जन जन पहुँचाने की मुहिम में जुटे भाई नवीन चतुर्वेदी जी को भी ह्रदय से साधुवाद पेश करता हूँ !

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  11. दोनों रचनाकारों की कुण्डलियाँ बहुत अच्छी लगीं ...सराहनीय प्रयास ..

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  12. साधना जी, शेखर भाई और संगीता जी आप सबका बहुत बहुत आभार कुंडलियाँ पसंद करने के लिए। योगराज जी इस तरह हौसला अफ़जाई करेंगे तो मैं सब छोड़कर कुंडलियाँ ही लिखने लगूँगा। बहुत बहुत शुक्रिया

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